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'दर्दपुर' पर चुप्पी देखकर / संजय चतुर्वेद

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

 रचनाकार: संजय चतुर्वेद                 

मक्कारों की प्रगति-व्यवस्था के भीतर उत्पात न करना

क्षमा कौल के उपन्यास की बात न करना


दरबदरी की मजलूमों की

हमीं बनाते हैं परिभाषा

फिलिस्तीन पर पीटें छाती घर की आफ़त लगे तमाशा

समाचार के धूर्त व्याकरण के भीतर हैं पत्रकार हम

बुदिख़ोर तबके में बैठा गर्हित पेशेवर विचार हम

सभी वजीफ़े हमें मिले हैं कल्चर के नग़मानिगार हम

सभी जगह पर लगे हुए हैं अपने बन्दे

बन्दे क्या हैं

उनकी भी हरकत के पीछे हमीं ख़ुदा हैं

अगर ज़रा भी समझदार हो

सबसे पुख़्ता रूलिंग क्लास हमीं को समझो

बाकी सब आने जाने हैं

हमासे तुम पंगे मत लेना

सधा हुआ आधा सच कहना

झूठ देखकर भी चुप रहना

फ़ैशन यश का रामबाण है

इसका बड़ा कमाऊ हल्क़ा

यहीं हमारी लक्ष्मण रेखा

उसके बाहर पाँव न धरना

क्षमा कौल के उपन्यास की बात न करना ।

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