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अंधेरे में / पूर्णिमा वर्मन

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CHANDER


अंधेरे में अचानक

सुंदर हो उठता है कमरा

सपाट हो जाती हैं दरारें

दीवारों की ।

चमकते हैं शेल्फ़ बिल्लौरी

और उन पर सजे हुए

स्फटिक

बिखेरते हैं अपनी किरनें

अंधेरे में ।

किताबें अचानक

नयी हो उठती हैं बिल्कुल

सजी हुई तरतीब से

बीच-बीच में उन्हें रोकने वाली

ख़ूबसूरत टेकों के साथ ।

सज जाते हैं फूल और मूर्तियाँ

आलों पर

खिड़की को पार कर

आने लगती है

नयी हवा ।

भय लगता है

कोई जला न दे रौशनी

और सपनों का यह शीश महल

बिखर जाये पल भर में ।

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