FANDOM

१२,२६२ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng.png
































रचनाकार: केदारनाथ सिंह

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~


पृथ्वी बुखार में जल रही थी

और इस महान पृथ्वी के

एक छोटे-से सिरे पर

एक छोटी-सी कोठरी में

लेटी थी वह

और उसकी सांस

अब भी चल रही थी


और सांस जब तक चलती है

झूठ

सच

पृथ्वी

तारे--सब चलते रहते हैं


डाक्टर वापस जा चुका था

और हालांकि वह वापस जा चुका था

पर अभी सब को उम्मीद थी

कि कहीं कुछ है

जो बचा रह गया है नष्ट होने से

जो बचा रह जाता है

लोग उसी को कहते हैं जीवन

कई बार उसी को

काई

घास

या पत्थर भी कह देते हैं लोग

लोग जो भी कहते हैं

उसमें कुछ न कुछ जीवन

हमेशा होता है


तो यह वही चीज़ थी

यानी कि जीवन

जिसे तड़पता हुआ छोड़कर

चला गया था डाक्टर

और वह अब भी थी

और सांस ले रही थी उसी तरह


उसकी हर सांस

हथौड़े की तरह गिर रही थी

सारे सन्नाटे पर

ठक-ठक बज रहा था सन्नाटा

जिससे हिल उठता था दिया

जो रखा था उसके सिरहाने


किसी ने उसकी देह छुई

कहा-- 'अभी गर्म है'

लेकिन असल में देह याकि दिया

कहां से आ रही थी जीने की आंच

यह जांचने का कोई उपाय नहीं था

क्योंकि डाक्टर जा चुका था

और अब खाली चारपाई पर

सिर्फ़ एक लम्बी

और अकेली सांस थी

जो उठ रही थी

गिर रही थी

गिर रही थी

उठ रही थी...


इस तरह अड़ियल सांस को

मैंने पहली बार देखा

मृत्यु से खेलते

और पंजा लड़ाते हुए

तुच्छ

असह्य

गरिमामय सांस को

मैंने पहली बार देखा

इतने पास से


('अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह से )

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki