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आखरी कलाम / पृष्ठ 4 / मलिक मोहम्मद जायसी

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CHANDER मुखपृष्ठ: आखरी कलाम / मलिक मोहम्मद जायसी

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सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥
एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
घामै दुखी उमत जेहि केरी । सो का मानै सुख अवसेरी ?॥
दुखी उमत तौ पुनि मैं दुखी । तेहि सुख होइतौ पुनि मैं सुखी ॥
पुनि करता कै आयसु होई । उमत हँकारु लेखा मोहिं देई ॥
कहब रसूल कि आयसु पावौं । पहिले सब धरमी लै आवौं ॥
होइ उतर `तिन्ह हौं ना चाहौं । पापी घालि नरक महँ बाहौं ॥

पाप पुन्नि कै तखरी होइ चाहत है पोच ।
अस मन जानि मुहम्मद हिरदै मानेउ सोच ॥31॥

पुनि जैहैं आदम के पासा । `पिता! तुम्हारि बहुत मोहिं आसा ॥
`उमत मोरि गाढे है परी । भा न दान, लेखा का धरी ? ॥
`दुखिया पूत होत जो अहै । सब दुख पै बापै सौं कहै ॥
बाप बाप कै जो कछु खाँगै । तुमहिं छाँडि कासौं पुनि माँगै ?॥
`तुम जठेर पुनि सबहिन्ह केरा । अहै सतति ,मुख तुम्हरै हेरा ॥
`जेठ जठेर जो करिहैं मिनती । ठाकुर तबहीं सुनिहैं मिनती ॥
`जाइ देउ सों बिनवौ रोई । मुख दयाल दाहिन तोहि होई ॥

`कहहु जाइ जस देखेउ, जेहि होवै उदघाट ।
`बहु दुख दुखी मुहम्मद, बिधि ! संकट तेहि काट' ॥32॥

`सुनहु पूत! आपन दुख कहऊँ । हौं अपने दुख बाउर रहऊँ ॥
`होइ बैकुंठ जो आयसु ठेलेउँ । दूत के कहे मुख गोहूँ मेलेउ ॥
`दुखिया पेट लागि सँग धावा । काढि बिहिस्त से मैल ओढावा ॥
`परल जाइ मंडल संसारा । नैन न सूझे, निसि -अधियारा ॥
`सकल जगत मैं फिरि फिरि रोवा । जीउ अजान बाँधि कै खोवा ॥
`भएँ उजियार पिरथिवीं जइहौं । औ गोसाइँ कै अस्तुति कहिहौं ॥
`लौटि मिलै जौ हौवा आई । तौ जिउ कहँ धीरझ होइ जाई ॥

`तेहि हुँत लाजि उठै जिउ, मुहँ न सकौं दरसाइ ।
`सो मुह लेइ, मुहम्मद ! बात कहौं का जाइ ?॥33॥

पुनि जैहैं मूसा क दोहाई । ऐ बंधू ! मोहिं उपकरू आई ॥
`तुम कहँ बिधिना आयसु दीन्हा । तुम नेरे होइ बातैं कीन्हा ॥
`उम्मत मोरि बहुत दुख देखा । भा न दान, माँगत है लेखा ॥
`अब जौ भाइ मोर तुम अहौ । एक बात मोहिं कारन कहौ ॥
`तुम अस ठटै बात का कोई । सोई कहौं बात जेहि होई ॥
`गाढे मीत ! कहौं का काहू ? । कहहु जाइ जेहि होइ निबाहू ॥
`तुम सँवारि कै जानहु बाता । मकु सुनि माया करै बिधाता ॥

मिनती करहु मोर हुँत सीस नाइ, कर जोरि,।
हा हा करै मुहम्मद `उमत दुखी है मोरि ॥34॥

सुनहु रसूल बात का कहौं । हौं अपने दुख बाउर रहौं ॥
कै कै देखेउँ बहुत ढिठाई । मुँह गरुवाना खात मिठाई ॥
पहिले मो कहँ आयसु दीन्हा । फरऊँ से मैं झगरा कीन्हा ॥
`रोधि नील क डारेसि झुरा । फुर भा झूठ, झूठ भा फुरा ॥
`पुनि देखै बैकुंठ पठाएउ । एकौ दिसि कर पंथ न पाएउँ ॥
पुनि जो मो कहँ दरसन भएऊ । कोह तूर रावट होइ गएऊ ॥
`भाँति अनेक मैं फिर फिर जापा । हर दावँन कै लीन्हेसि झाँपा ॥

निरखि नैन मैं देखौं, कतहुँ परै नहिं सूझि ।
`रहौ लजाइ, मुहम्मद! बात कहौं का बूझि'? ॥35॥

दौरि दौरि सबही पहँ जैहैं । उतर देइ सब फिरि बहरैहैं ॥
ईसा कहिन कि कस ना कहत्यों । जौ किछु कहे क उत्तर पवत्यों ॥
मैं मुए मानुस बहुत जियावा । औ बहुतै जिउ-दान दियावा ॥
इब्राहिम कह, कस ना कहत्यों । बात कहे बिन मैं ना रहत्यों ॥
मोसौं खेलु बंधु जो खेला । सर रचि बाँधि अगिन महँ मेला ॥
तहाँ अगिन हुँत भइ फुलवारी । अपडर डरौं, न परहिं सँभारी ॥
नूह कहिन, जप परलै आवा । सब जग बूड, रहेउँ चढि नावा ॥

काह कहै काहू से, सबै ओढाउब भार ॥
जस कै बैन मुहम्मद, करू आपन निस्तार ॥36॥

सबै भार अस ठेलि ओढाउब । फिर फिर कहब, उतर ना पाउब ॥
पुनि रसूल जैहै दरबारा । पैग मारि भुइँ करब पुकारा ॥
तै सब जानसि एक गोसाईं । कोइ न आव उमत के ताई ॥
जेहि सौ कहौं सो चुप होइ रहै । उमत लाइ केहु बात न कहै ॥
मोहिं अस तहीं लाग करतारा । तोहिं होइ भल सोइ निस्तारा ॥
जो दुख चहसि उमत कहँ दीन्हा । सो सब मैं अपने सिर लीन्हा ॥

लेखि जोखि जो आवै मरन गँजन दुख दाहु ।
सो सब सहै मुहम्मद, दुखी कर जनि काहु ॥37॥

पुन रिसाइ कै कहै गोसाईं । फातिम कहँ ढूँढहु दुनियाईं ॥
का मोसौं उन झगर पसारा । हसन हुसैन कहौ को मारा ॥
ढूँढे जगत कतहुँ ना पैहैं । फिरि कै जाइ मारि गोहरैहैं ॥
ढूँढि जगत दिनिया सब आएउँ । फातिम-खोज कतहुँ ना पाएउँ ॥
`आयसु होइ, अहैं पुनि कहाँ' । उठा नाद हैं धरती महाँ ॥
`मूँदै नैन सकल संसारा । बीबी उठैं, करै निस्तारा ॥
जो कोई देखै नैन उघारी । तेहि कहँ छार करौं धरि जारी' ॥

आयसु होइहि देउ कर , नैन रहै सब झाँपि ॥
एक ओर डरैं मुहम्मद, उमत मरै डरि काँपि ॥38 ॥

उट्ठिन वीवी तब रिस किहें । हसन-हुसेन दुवौ सँग लीहें ॥
`तैं करता हरता सब जानसि । झूँठै फुरै नीक पहिचानसि ॥
`हसन हुसेन दुवौ मोर वारे । दुनहु यजीद कौन गुन मारे ? ॥
`पहिले मोर नियाव निबारू । तेहि पाछे जेतना संसारू ॥
`समुझें जीउ आगि महँ दहऊँ । देहु दादि तौ चुप कै रहऊँ ॥
`नाहि त देउँ सराप रिसाई । मारौं आहि अर्श जरि जाई ॥

`बहु संताप उठै निज, कैसहु समुझि न जाइ ।
`बरजहु मोह मुहम्मद, अधिक उठै दुख-दाइ' ॥39॥

पुनि रसूल कहँ आयसु होई । फातिम कहँ समुझावहु सोई ॥
`मारै आहि अर्श जरि जाई । तेहि पाछे आपुहि पछिताई ॥
` जो नहिं बात क करै बिषादू । जानौ मोहिं दीन्ह परसादू ॥
`जो बीबी छाँडहिं यह दोखू । तौ मैं करौं उमत कै मोखू ॥
नाहिं न घालि नरक महँ जारौं । लौटि जियाइ मुए पर मारौं ॥
`अग्नि-खंभ देखहु जस आगे । हिरकत छार होइ तेहि लागे ॥
`चहुँ दिसि फेरि सरग लै लावौं । मँगरन्ह मारौं, लोह चटावौं ॥

तेहि पाछे धरि मारौं घालि नरक के काँठ ।
बीबी कहँ समुझावहु, जौ रे उमत कै चाँट ॥40॥


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