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आखरी कलाम / पृष्ठ 6 / मलिक मोहम्मद जायसी

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CHANDER मुखपृष्ठ: आखरी कलाम / मलिक मोहम्मद जायसी


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सुनि फरमान हरष जिउ बाढे । एक पाँव से भए उठि ढाढे ॥
झारि उमत लागी तब तारी । जेता सिरजा पुरुष औ नारी ॥
लाग सबन्ह सहुँ दरसन होई । ओहि बिनु देखे रहा न कोई ॥
एक चमकार होइ उजियारा । छपै बीजु तेहि के चमकारा ॥
चाँद सुरुज छपिहैं बहु जोती । रतन पदारथ मानिक मोती ॥
सो मनि दिपें जो कीन्हि थिराई । छपा सो रंग गात पर आई ॥
ओहु रूप निरमल होइ जाई । और रूप ओहि रूप समाई ॥

ना अस कबहूँ देखा, ना केहू ओहि भाँति ।
दरसन देखि मुहम्मद मोहि परे बहु भाँति ॥ 51॥

दुइ दिन लहि कोउ सुधि न सँभारे । बिनु सुधि रहे, न नैन उघारे ॥
तिसरे दिन जिबरैल जौ आए । सब मदमाते आनि जगाए ॥
जे हिय भेदि सुदरसन राते । परे परे लोटैं जस माते ॥
सब अस्तुति कै करै बिसेखा । ऐस रूप हम कतहुँ न देखा ॥
अब सब गएउ जलम-दुख धोई । जो चाहिय हठि पावा सोई ॥
अब निहचिंत जीउ बिधि कीन्हा । जौ पिय आपन दरसन दीन्हा ॥
मन कै जेति आस सब पूजी । रही न कोई आस गति दूजी ॥

मरन, गँजन औ परिहँस, दुख, दलिद्र सब भाग ।
सब सुख देखि मुहम्मद, रहस कूद जिउ लाग ॥52॥

जिबराइल कहँ आयसु होइहि । अछरिन्ह आइ आगे पय जोइहिं ॥
उमत रसूल केर बहिराउब । कै असवार बिहिस्त पहुँचाउब ॥
सात बिहिस्त बिधिनै औतारा । औ आठईं शदाद सँवारा ॥
सो सब देबउमत कहँ बाँटी । एक बराबर सब कहँ आँटी ॥
एक एक कहँ दीन्ह निवासू । जगत-लोक विरसैं कबिलासू ॥
चालिस चालिस हूरैं सोई । औ सँग लागि बियाही जोई ॥
ओ सेवा कहँ अछरिन्ह केरी । एक एक जनि कहँ सौ-सौ चेरी ॥

ऐसे जतन बियाहैं जस साजै बरियात ।
दूलह जतन मुहम्मद बिहिस्त चले बिहँसात ॥53॥

जिबराइल इतात कहँ धाए । चोल आनि उम्मत पहिराए ॥
पहिरहु दगल सुरँग-रँग राते । करहु सोहाग जनहु मद-माते ॥
ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहै । चंद बदन औ कोकब मोहै ॥
न्हाइ खोरि अस बनी बराता । नबी तँबोल खात मुख राता ॥
तुम्हरे रुचे उमत सब आनब । औ सँवारि बहु भाँति बखानब ॥
खडे गिरत मद-माते ऐहैं । चढि कै घोडन कहँ कुदरैहैं ॥
जिन भरि जलम बहुत हिय जारा । बैठि पाँव देइ जमै ते पारा ॥

जैसे नबी सँवारे, तैसे बने पुनि साज ।
दूलह जतन मुहम्मद बिहिस्ति करैं सुख राज ॥54॥

तानब छत्र मुहम्मद माथे । औ पहिरैं फूलन्ह बिनु गाँथे ॥
दूलह जतन होब असवारा । लिए बरात जैहैं संसारा ॥
रचि रचि अछरिन्ह कीन्ह सिंगारा । बास सुबास उठै महकारा ॥
आज रसूल बियाहन ऐहैं । सब दुलहिन दूलह सहुँ नैहैं ॥
आरति करि सब आगे ऐहैं । नंद सरोदन सब मिलि गैहैं ॥
मँदिरन्ह होइहि सेज बिछावन । आजु सबहि कहँ मिलिहैं रावन ॥
बाजन बाजै बिहिस्त-दुवारा । भीतर गीत उठै झनकारा ॥

बनि बनि बैठीं अछरी , बैठि जोहैं कबिलास ।
बेगहि आउ मुहम्मद, पूजै मन कै आस ॥55॥

जिबरईल पहिले से जैहैं । जाइ रसूल बिहिस्त नियरैहैं ॥
खुलिहैं आठौं पँवरि दुवारा । औ पैठे लागे असवारा ॥
सकल लोग जब भीतर जैहैं पाछे होइ रसूल सिधैहैं ॥
मिलि हूरैं नेवछावरि करिहैं । सबके मुखन्ह फूल अस झरिहैं ॥
रहसि रहसि तिन करब किरीडा । अमर कुंकुमा भरा सरीरा ॥
बहुत भाँति कर नंद सरोदू । बास सुबास उठै परमोदू ॥
अगर, कपूर, बेना कस्तूरी । मँदिर सुबास रहब भरपूरी ॥

सोवन आजु जो चाहै, साजन मरदन होइ ।
देहिं सोहाग मुहम्मद, सुख बिरसै सब कोइ ॥56॥

पैठि बिहिस्त जौ नौनिधि पैहैं ।अपने अपने मँदिर सिधैहैं ॥
एक एक मंदिर सात दुवारा । अगर चँदन के लाग केवारा ॥
हरे हरे बहु खंड सँवारे । बहुत भाँति दइ आपु सँवारे ॥
सोने रूपै घालि उँचावा । निरमल कुहुँकुहुँ लाग गिलावा ॥
हीरा रतन पदारथ जरे । तेहि क जोति दीपक जस बरै ॥
नदी दूध अतरन कै बहहीं । मानिक मोति परे भुइँ रहहीं ॥
ऊपर गा अब छाहँ सोहाई । एक एक खंड चहा दुनियाई ॥

तात न जूड न कुनकुन, दिवस राति नहि दुक्ख ।
नींद न भूख मुहम्मद, सब बिरसैं अति सुक्ख ॥57॥

देखत अछरिन केरि निकाई । रूप तें मोहि रहत मुरछाई ॥
लाल करत मुख जोहब पासा । कीन्ह चहैं किछु भोग-बिलासा ॥
हैं आगे बिनवैं सब रानी । और कहैं सब चेरिन्ह आनी ॥
ए सब आवैं मोरे निवासा । तुम आगे लेइ आउ कबिलासा ॥
जो अस रूप पाट-परधानी । औ सबहिन्ह चेरिन्ह कै रानी ॥
बदन जोति मनि माथे भागू । औ बिधि आगर दीन्ह सोहागू ॥
साहस करै सिंगार सँवारी । रूप सुरूप पदमिनी नारी ॥

पाट बैठि नित जोहैं, बिरहन्ह जारैं माँस ।
दीन दयाल, मुहम्मद ! मानहु भोग-विलास ॥58॥

सुनहिं सुरूप अबहिं बहु भाँती । इनहिं चाहि जो हैं रुपवाँती ॥
सातौं पवँरि नघत तिन्ह पेखब । सातइँ आए सो कौकुत देखब ॥
चले जाब आगे तेहि आसा । जाइ परब भीतर कबिलासा ॥
तखत बैठि सब देखब रानी । जे सब चाहि पाट-परधानी ॥
दसन-जोति उट्ठ चमकारा । सकल बिहिस्त होइ उजियारा ॥
बारहबानी कर जो सोना । तेहि तें चाहि रूप अति लोना ॥
निरमल बदन चंद कै जोती । सब क सरीर दिपैं जस मोती ॥

बास सुबास छुवै जेहि बेधि भँवर कहँ जात ।
बर सो देखि मुहम्मद हिरदै महँ न समात ॥59॥

पैग पै जस जस नियराउब । अधिक सवाद मिलै कर पाउब ॥
नैन समाइ रहै चुप लागे । सब कहँ आइ लेहिं होइ आगे ॥
बिसरहु दूलह जोबन-बारी । पाएउ दुलहिन राजकुमारी ॥
एहि महँ सो कर गहि लेइ जैहैं । आधे तखत पै लै बैठैहैं ॥
सब अछूत तुम कहँ भरि राखे । महै सवाद होइ जौ चाखै ॥
नित पिरीत, नित नव नव नेहु । नित इठि चौगुन होइ सनेहू ॥
नित्तइ नित्त जो बारि बियाहै । बीसौ बीस अधिक ओहिं चाहै ॥

तहाँ त मीचु, न नींद, दुख, रह न देह महँ रोग ।
सदा अनँद `मुहम्मद', सब सुख मानैं भोग ॥60॥

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