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आज नयन के बँगले में / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


आज नयन के बँगले में

संकेत पाहुने आये री सखि!


जी से उठे

और बेसुधी-

के बन घूमें

युगल-पलक

ले चितवन मीठी,

पथ-पद-चिह्न

चूम, पथ भूले!

दीठ डोरियों पर

माधव को


बार-बार मनुहार थकी मैं

पुतली पर बढ़ता-सा यौवन

ज्वार लुटा न निहार सकी मैं !

दोनों कारागृह पुतली के

सावन की झर लाये री सखि!

आज नयन के बँगले में

संकेत पाहुने आये री सखि !

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