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आज मेरे नयन के तारक हुए जलजात देखो! / महादेवी वर्मा

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आज मेरे नयन के तारक हुए जलजात देखो!

अलस नभ के पलक गीले,
कुन्तलों से पोंछ आई;
सघन बादल भी प्रलय के
श्वास से मैं बाँध लाई;

पर न हो निस्पन्दता में चंचला भी स्नात देखो!

मूक प्राणायाम में लय-
हो गई कम्पन अनिल की;
एक अचल समाधि में थक,
सो गई पलकें सलिल की;

प्रात की छवि ले चली आई नशीली रात देखो!

आज बेसुध रोम रोमों-
में हुई वह चेतना भी;
मर्च्छिता है एक प्रहरी सी
सजग चिर वेदना भी;

रश्मि से हौले जाओ न हो उत्पात देखो!

एक सुधि-सम्बल तुम्हीं से,
प्राण मेरा माँग लाया;
तोल करती रात जिसका,
मोल करता प्रात आया;

दे बहा इसको न करुणा की कहीं बरसात देखो!

एकरस तम से भरा है,
एक मेरा शून्य आँगन;
एक ही निष्कम्प दीपक-
से दुकेला ही रहा मन;

आज निज पदचाप की भेजो न झंझावात देखो!

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