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आत्मज्ञान / सूरदास

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CHANDER


अपुनपौ आपुन ही बिसर्‌यौ ।

जैसे स्वान काँच-मंदिर मैं, भ्रमि-भ्रमि भूकि पर्‌यौ ।

ज्यौं सौरभ मृग-नाभि बसत है, द्रुम तृन सूँधि फिर्‌यौ ।

ज्यौं सपने मै रंक भूप भयौ, तसकर अरि पकर्‌यौ ।

ज्यौं केहरि प्रतिबिंब देखि कै, आपन कूप पर्‌यौ ।

जैसें गज लखि फटिकसिला मैं, दसननि जाइ अर्‌यौ ।

मर्कट मूठि छाँड़ि नहीं दीनी, घर-घर-द्वार फिर्‌यौ ।

सूरदास नलिनी कौ सुवटा, कहि कौनैं पकर्‌यौ ॥1॥


अपुनपौ आपुन ही मैं पायौ ।

सब्दहि सब्द भयौ उजियारो, सतगुरु भेद बतायौ ।

ज्यौं कुरंग-नाभी कस्तूरी, ढूँढ़त फिरत भुलायौ ।

फिरि चितयौ जब चेतन ह्वै करि, अपनैं ही तन छायौ ।

राज-कुमारि कंठ-मनि-भूषन भ्रम भयौ कहूँ गँवायौ ।

दियौ बताइ और सखियनि तब, तनु कौ ताप नसायौ ।

सपने माहिं नारि कौं भ्रम भयौ, बालक कहूँ हिरायौ ।

जागि लख्यौ, ज्यौं कौ त्यौं ही है, ना कहूँ गयौ न आयौ ।

सूरदास समुझे को यह गति, मनहीं मन मुसुकायौ ।

कहि न जाइ या सुख की महिमा, ज्यौं गूँगैं गुर खायौ ॥2॥

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