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आल्हा

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 रचनाकार: --                 

संज्ञा तारिन गइए, घर-घर दीपक दए बराइ।

चँगि-चुँगि गइआँ बन्ती डगरिआँ, उड़ि-उड़ि पंच्छी लए बसेर।

सुमिरि सारदा के पग ढरिए, गुस्र् अपने के चरण मनाइ।

भुइआँ गइए जाई खेरे की, माता नामु न जनउँ तुमार।

तुमरे अखाड़े मइँ गाउत हउँ, बेड़ा खेइ लगइअउ पार।

जोइ-जोइ अक्षस्र् माता भूलउँ, दुरगा कण्ठ बइठि लिखिजाउ।

रज नइपाली नइनागढ़ को, जिन घर अमर ढोल अराई।

राजा इन्दर को बरदानी, अउमरेबे कउ नाइँ उराइ।

तिनके घर मइँ सुनमाँ उपजी, जिन सब जादू पढ़े बनाइ।

बरस पन्द`ह की उम्मीर की, बाँको सपु न बरनो जाइ।

संग सहेलीं सुनमाँ लइके, फुल बगिया मइँ पहुँची जाइ।

सखियाँ मंगल गाबन लागीं, अउ सुनमाँ सइ लगी बतान।

दउलति नाहीं का राजा पइ, जो नइँ तुमरो करो बिआउ।

इतनी सुनिके सुनमाँ चलिभई, अस्र् माता तइ पहुँची जाइ।

बेटी बोली तब माता सइ, माता सनउँ हमारी बात।

संग हमारे की ससुरे गइंर्, तुम हमरो नाइँ करो बिआउ।

इतनी सुनिके रानी पहुँची, अस्र् राजा तइ पहुँची जाइ।

सोउत राजा कउ जब देखो, रानी चरन पलोटन लागि।

हॉत जोरि के रानी बोली, स्वामी सुनउँ हमारी बात।

कइ कुल हीने बइपाली हइँ, बेटी रही कँुआरी जाइ।

बर संजोग भई जा कन्या, तुम बेटी को रचउ बिआउ।

इत्ती सुनिके राजा चलिभए, अउ डिउढ़ी मइँ पहुँचे जाइ।

नाऊ, बारी, भाग, पुरोहित, चारउ नेगी लए बुलाइ।

तीनि लाख को टीका लइके, सो नेगिन कउ दओ गहइ।

देस-देस टीका जाबउ, अउ बेटी को रचउ बिआहु।

एकु न जइअउ नगर महोबे, जहँ पर बसइँ रजा परमाल।

लइके टीका नेगी चलिभए, बिजिया बेटा संग लिबाइ।

सिगरे राजन के हुइ आए, टीका कोई कबूलइ नाँइ।

घूमि-घूमि के सब फिरि आए, अउ नइनागढ़ पहुँचे आय।

जहँ पर बइठे नइपाली ते, नेगिन नबिके करी सलाम।

हम सब राजन के हुइ आये, कोई तिलक चढ़ाबइ नाइँ।

सुनिके बातइँ जे नेगिन कीं, मन मइँ सोचि-सोचि जाइँ।

कछू दिनन को अरसा गुजरो, अब आगे को सुनउ हबाल।

देस-देस के राजा आए, नइनागढ़ मइँ पहुँचे आइ।

ठउरन ठउरन तम्बुआ लगिअए, झंडन रही लालरी छाइ।

सुनी हकीकति नइपाली नइँ लसकस्र् धूरे पहुँचों आइ।

बिजिआ बेटा कउ बुलवाओ तुरन्त नगाड़ो लओ मँगाइ।

सो धरबाइ दओ घूरेपइ, राजा हुकुम दओ करबाइ।

चोब नगाड़ा पहिले मारइ, सो बेटी कउ सकइ बिहाइ।

जितने राजा चढ़ि आये ते, तिन्नइँ नजरि गुजारी आइ।

करी बंदिगी नइपाली कउ, अउ राजा सइ हे हवाल।

तुमरी सरबरि के हम नाहीं, जो बेटी सँग करइँ बिआहु।

कुम्मक तुमरी हम आए हइँ, हमरे बचन परमान।

हिआँ कि बातइँ हिअनइँ छोंड़उ, अस्र् आगे को सुनउ हबाल।

जउ प`ाण पकरो हइ सुनमाँ नइँ, मइँ आल्हा संग करउँ बिआहु।

क्वाँरी रहिहउँ मइँ नइहर मइँ, दूजे संग करँउ बिआहु।

पिंजरा लइके हीरामनि को, सो पलिका पइ लओ धराइ।

तुमकउ बारे सइ पालो हइ, बहुतक मेबा दई खिलाइ।

कामु हमारो अब लागो हइ, सो गाढ़े मइँ होउ सहाइ।

सुअना जाबउ तुम महुबे कउ, आलइ खबीर सुनावइ जाइ।

तब हीरामनि बोलन लागे, सुनमाँ पाती देउ लिखाइ।

अबहीं जइहउँ नगर महोबे, आलहि खबरि सुनइहउँ जाइ।

कागदु कलपी को लइ लीनो, अपनो कलमदानु लइ हाँत।

पहिले लिखिके सिरनामा कउ, फिरि ऊदनि कउ लिखो प`नामु।

जउ प`नु पकरो हइ सुनमाँ नइँ, की आलइ संग होइ बिआउ।

साजि बराइत तुम लइ आबउ, सातउ भामरि लेउ बिआउ।

साजि बराइत तुम लइ आबउ, सातउ भामरि लेउ डराइ।

बाना राखउ रजपूती को, तउ तुम चढ़िके करउ बिहाअु।

नाँइ तउ नालति रजपूती कउ, तुमरे जीवन कउ धिक्कार।

बड़ो भरोसो मइँ राखति हउँ, दवेर मेरे उदइ सिंध राइ।

चिट्ठी लिखिके रनि सुनमाँ नइँ, सुआ के गरे दई बँधवाइ।

चलिभओ सुअना तब महुबे कउ, जाके चलत न लागी बार।

राति दिना को धाबा करिके, सुअना महुबे पहुँचो जाइ।

चन्दन बगिआ मइँ सुअना गओ, ऊदनि तहीं पहुँच गए आइ।

पाती देखी गरे सुआ के, ऊदन बासइ पूछन लागि।

कहाँ कि पाती तुम लाए हउ, आगे कउन देस कउ जाउ।

सुअना बोलइ तब ऊदनि सइ, ठाकुर सुनउ हमारी बात।

नइनागढ़ सइ हम आए हइँ, सुनमाँ रानी दओ पठाइ।

महलु बताइ देउ आल्हा को, मिलिहइँ कहाँ उदैसिंध राइ।

हँसिके ऊदनि बोलने लागे, पंछी सुनउँ हमारी बात।

छोटे भइआ हम आल्हा के, हमरोई नाँव उदैसिंध राइ।

कइसे पाती लइ आए हउ, सो तुम हालु देउ बतराइ।

गरे सइ पाती सुअना खोली, अउ ऊदनि कउ संग लिबाइ।

पाती बाँची हइ ऊदनि नइँ, मन मइँ बहुत खुसी हुइ जाइँ।

लइके पाती ऊदनि चलिभए, अउ सुअना कउ संग लिबाइ।

लगी कचहरी परमालइ की, भारी जुरो हतो दरबास्र्।

सोने सिंघासन राजा बइटे, ऊपइ चँऊर ढुरइँ गजगाह।

छत्रपती, गढ़पती, नरतपती बइठे बड़े-बड़े सरदार।

आला, मलिखे, ढेबा बइठे, समुहें नगिन धरे तरबारि।

तहँही ऊदनि दाखिल हुइअए, अउ बँगला मइँ पहुँचे जाइ।

करी बन्दिगी तब राजा कउ, ऊदनि पाती दई चलाइ।

पाती बाँची परलय हुइ अई, मुँह सइ कछू न निकरी बात।

कहा खबरिआ हइ पाती मइँ, काहे पाती लई दबाइ।

कहइँ चँदले तब मलिखे सइ, हमसइ कछू कही ना जाइ।

पाती आई नइनागढ़ की, अउ बेटी नइँ दई पठाइ।

देस-देस टीका फिरि आओ, काहू ब्आहु कबूलो नाइँ।

सोई टीका महुबे आओ, मलिखे तुरत देउ लउटारि।

मलिखे बोले तब राजा सइ, दादा सुनउँ हमारी बात।

तुमइँ हसउआ को उस्र् नाहीं, कइसी कहिहइ जगु संसास्र्।

जो घर आओ टीका फेरउ, तउ रजपूती धरमु नसाइ।

राजा बोले तब मलिखेसइ, बेटा सोचि लेउ मन माँहि।

अमर ढोला हइँ नइपाली के, तासउँ कोई जीतन को नाइँ।

टीका फेरिदेउ तुम मलिखे, इतनी मानउँ कही हमार।

टीका आओ हम ना फिरिअइँ, चाहे प`ान रहइँ की जाइँ।

मलिखे बोले तब ऊदन सइ, तुम सुन्लेउ लहुरबा भाइ।

हुकुम फेरिदेउ सब लसकर मइँे, जल्दी फउज होइँ हुसिआर।

बजइ नगाड़ा मेरे दल मइँ, छत्री समीर होइँ हुसिआर।

इतनी सुनिके वीर चँदले, अपने रँग महल गए आइ।

पाट-बन्धनी रानी मल्हना, राजा हुँअन पहुँच गए आइ।

आउत देखो जब राजा कउ, रानी हाँत जोरि भइ ठाढ़ि।

ऊँचो चिहरा किउँ नीचो भओ, क्यूँ लचिअओ मूँछ को बास्र्।

हालु बताइ देउ जिअरा को, काहे बदनु गओ कुमिलाइ।

कहइँ चँदेले तब रानी सइ, हमसइ कछू कही ना जाइ।

कठिन ममासी नइनागढ़ हइ, तहँ को टीका पहुँचो आइ।

सुनमईँ ब्याहन जो-जो जइहद, तिनमइँ कोई लउटन को नाइँ।

मइँनइँ मलिखे कउ समुझाओ, कोई सुनइ न मेरी बात।

तुम समुझाबउ इन लरिकन कउ, घर मइँ बइठि रहइँ हरगाइ।

इतनी सुनिके रानी बोली, हरकारे कउ लओ बुलाइ।

ऊदनि-मलिखे कउ लुइ आबउ, मेरी नजरि गुजारउ आइ।

उदनि-मलिखे कउ लुइ आबउ, मेरी नजरि गुजारउ आइ।

ऊदनि, मलिखे दोनउँ मिलिअए, तब हरकारा नइँ करी सलाम।

तुमइँ बुलउआ हइ मल्हना को, ठाकुर चलउ हमारे साथ।

उनहीं पाइँन दोनउँ चलिभए, अउ महलन मइँ पहुँचे आइ।

चरन लागि के रानि मल्हना के, अउ माथे सइ लए लगाइ।

मल्हना कहन लगी मलिखे सइ, बेटा हमइँ देउ बतलाइ।

कहाँ कि त्यारी तुमनइँ कीनी, कइसो डंका दओ बजाइ।

टीका आओ नइनागढ़ को, बाकी मास्र् सही ना जाइ।

मल्हना समुझाबइ मलिखे कउ, बेटा सुनउ हमारी बात।

जालिम राजा नइनागढ़ को, बाकी मास्र् सही ना जाइ।

मलिखे बोले तब मल्हना सइ, माता सुनउँ हमारी बात।

घर आओ टीका जो फेरइँ, मेरो जिअत मन्नु हुइ जाइ।

मरद बनाए मरिजइबे कइ, अउ खटिया पइ मरइ बलाइ।

जो मरि जइहँइ नइनागढ़ मइँ, तउ जग हुइहइ, नाँउ हमारा।

आल्हा ब्याहन कउ ना रहिअइँ, बातइँ कहिवे कउ रहिजाइँ।

हुकुम फिराइ दे महुबे मइँ, सखियाँ करइँ मंगलाचार।

तुरत बुलाइ लओ ढेबा कउ, भइया हाल देउ बतलाइ।

ब्याहन आल्इ अब हम जइहँइ, सो मोइ सगुन देउ बतलाइ।

खोलिके पोथी बाँचन लागो, अउ ज्युतिषि को करइ बिचार।

सगुनु हमारो जउ बोलतु हइ, तुमरो कामु सिद्ध हुइ जाइ।

अपने पंडित कउ बुलवाओ, तुरतइ लगुन लई सुधबाइ।

तेलु चढ़उअरि अबही कल्लेउ, अउ मड़ए कउ लउ सुधबाइ।

नेग ब्याह के सब करबावउ, जल्दी फउज लेउ सजबाइ।

बाहर रानी परमालइ की, सो मड़ए मइँ पहुँची आइ।

गउ-गोबर सइ अगुन लिपाओ, अउ मोतिन सइ चउकु पुराइ।

कलस सोबरन के धरबाए, चन्दन चउकी दइंर् डराइ।

सात सुहागिन तेलु चढ़ाबइँ, पंडित वेद विचारन लागि।

नहुखुर होन लगो आल्हा को, सखिआँ सगुन मनावन लागि।

नाऊ झिगरो रानी मल्हना सइ, हमकउ नेगु देउ मँगवाइ।

बड़े-बडे पुरवा दुइ महुबे के, सो नाऊ कउ दए इनाम।

मुँह सइ माँगी जो नेगिन नइँ, मल्हना तुरत दओ मँगवाइ।

उबटन करिके तन केसरि को, गंगाजल सइ करि स्नान।

कर मइँ कंगनु आल्हा बाँधो, दूल्हा बने बनाकर राइ।

कूदि पालकी इप चढ़ि बइठे, अउर कुँअटा पइ पहुँचे जाइ।

कुँआ कि मनि पइ देबइ पहुँची, तब मल्हना नइँ दओ जबावु।

हम तउ जानी हमरे आल्हा, सो देबइ तुम लए छिड़ाइ।

कुँआ ब्याहइँ हम आल्हा को, तब छाती को डाहु बुझाइ।

कुँआकि मनि पइ मल्हना बइठी, अपनों गोडु दओ लटकाइ।

तुमरे नाम कु बागु लगइहइँ, माता काढ़उ कुँआ सइ पाँव।

अइसेई सातउ भामीर डारीं, अउ धरि बहिआँ लओ उठाइ।

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