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इस तरह ढक्कन लगाया रात ने / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


इस तरह ढक्कन लगाया रात ने

इस तरफ़ या उस तरफ़ कोई न झाँके।


बुझ गया सूर्य

बुझ गया चाँद, तस्र् ओट लिये

गगन भागता है तारों की मोट लिये!


आगे-पीछे,ऊपर-नीचे

अग-जग में तुम हुए अकेले

छोड़ चली पहचान, पुष्पझर

रहे गंधवाही अलबेले।


ये प्रकाश के मरण-चिन्ह तारे

इनमें कितना यौवन है?

गिरि-कंदर पर, उजड़े घर पर

घूम रहे नि:शंक मगन हैं।


घूम रही एकाकिनि वसुधा

जग पर एकाकी तम छाया

कलियाँ किन्तु निहाल हो उठीं

तू उनमें चुप-चुप भर आया


मुँह धो-धोकर दूब बुलाती

चरणों में छूना उकसाती

साँस मनोहर आती-जाती

मधु-संदेशे भर-भर लाती।

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