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उठ महान / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


उठ महान ! तूने अपना स्वर

यों क्यों बेंच दिया?

प्रज्ञा दिग्वसना, कि प्राण् का

पट क्यों खेंच दिया?


वे गाये, अनगाये स्वर सब

वे आये, बन आये वर सब

जीत-जीत कर, हार गये से

प्रलय बुद्धिबल के वे घर सब!


तुम बोले, युग बोला अहरह

गंगा थकी नहीं प्रिय बह-बह

इस घुमाव पर, उस बनाव पर

कैसे क्षण थक गये, असह-सह!


पानी बरसा

बाग ऊग आये अनमोले

रंग-रँगी पंखुड़ियों ने

अन्तर तर खोले;


पर बरसा पानी ही था

वह रक्त न निकला!

सिर दे पाता, क्या

कोई अनुरक्त न निकला?


प्रज्ञा दिग्वसना? कि प्राण का पट क्यों खेंच दिया!

उठ महान् तूने अपना स्वर यों क्यों बेंच दिया!

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