Fandom

Hindi Literature

उद्धव का गोपियों को पाती देना / सूरदास

१२,२६२pages on
this wiki
Add New Page
Talk0 Share
http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng.png
































CHANDER


ब्रज घर-घर सब होति बधाइ ।
कँचन कलस दूब दधि रोचन ,लै वृँदाबन आइ ॥
मिली ब्रजनारि तिलक सिर कीनौ, करि प्रदच्छिना तासु ।
पूछत कुसल नारि-नर हरषत, आए सब ब्रज-बासु ॥
सकसकात तनधकधकात उर, अकबकात सब ठाढ़े ।
सूर उपँग-सुत बोलत नाहीं, अति हिरदै ह्वै गाढ़े ॥1॥

ऊधौ कहौ हरि कुसलात ।
कह्यौ आवन किधौं नाहीं, बोलिऐ मुख बात ॥
एक छिन जुग जात हमकौं, बिनु सुने हरि प्रीति ।
आपु आए कृपा कीन्हीं , अब कहौ कछु नीति ॥
तब उपँग-सुत सबनि बोले, सुनौ श्रीमुख जोग ।
सूर सुनि सब दौरि आईं, हटकि दीन्हौ लोग ॥2॥

गोपी सुनहु हरि संदेस ।
गए संग अक्रूर मधुबन, हत्यौ कंस नरेस ॥
रजक मार्‌यौ बसन पहिरे, धनुष तोर्‌यौ जाइ ।
कुबलया, चानूर मुष्टिक, दिए धरनि गिराइ ॥
मातु पितु के बंद छोरे, बासुदेव कुमार ।
राज दीन्हौ उग्रसेनहिं, चौंर निज कर ढार ॥
कह्यौ तुमकौं ब्रह्म ध्यावन, छाँड़ि बिषय बिकार ।
सूर पाती दई लिखि मोंहिं, पढ़ौ गोप-कुमारि ॥3॥

पाती मधुबन ही तैं आई ।
सुंदर स्याम आपु लिखि पठई, आइ सुनौ री माई ॥
अपने गृह तैं दौरीं, लै पाती उर लाई ।
नैननि निरखि निमेष न खंडित, प्रेम-तृषा न बुझाई ॥
कहा करौं सूनौ गह गोकुल, हरि बिनु कछु न सुहाई ।
सूरदास ब्रज चूक तैं, स्याम सुरति बिसराई ॥4॥

निरखति अंक स्याम सुंदर के बार बार लावतिं लै छाती ।
लोचन जल कागद मसि मिलि कै, ह्वै गइ स्याम स्याम जू की पाती ॥
गोकुल बसत नंदनंदन के, कबहुँक बयारि न लागी ताती ।
अरु हम उती कहा कहैं ऊधौ, जब सुनि बेनु नाद सँग जाती ॥
उनकैं लाड़ बनति नहिं काहूँ, निसि दिन रसिक-रास-रस राती ।
प्रान-नाथ तुम कबहि मिलौगे, सूरदास प्रभु बाल-सँघाती ॥5॥

पाती मधुबन तैं आई ।
ऊधौ हरि के परम सनेही, ताकैं हाथ पठाई ॥
कोले पढ़ति, कोउ धरति नैन पर, काहूँ हृदै लगाई ।
कोउ पूछति फिरि फिर ऊधौ कौं, आपुन लिखी कन्हाई ?
बहुरौ दई फेरि ऊधौ कौं, तब उन बाँचि सुनाई ।
मन मैं ध्यान हमारौ राख्यौ, सूर सदा सुखदाई ॥6॥

लिखि आई ब्रजनाथ की छाप ।
ऊधौ बाँधे फिरत सीस पर, बाचत आवै ताप ॥
उलटि रीति नंदनंदन की, घर-घर भयौ संताप ।
कहियौ जाइ जोग आराधैं, अविगत अकथ अमाप ॥
हरि आगैं कुबिजा अधिकारिनि, को जीवै इहिं दाप ।
सूर सँदेस सुनावत लागे, कहौ कौन यह पाप ॥7॥

कोउ ब्रज बाँचत नाहिंन पाती ।
कत लिखि-लिखि पठवत नंद-नंदन, कठिन बिरह की काँती ॥
नैन स्रजल कागद अति कोमल , कर अँगुरी अति ताती ।
परसैं जरैं, बिलौकैं भीजै, दुहूँ भाँति दुख छाती ॥
को बाँचै ये अंक सूरप्रभु कठिन मदन-सर-घाती ।
सब सुख लै गए स्याम मनौहर, हमकौं दुख दै थाती ॥8॥

ऊधौ कहा करैं लै पाती ।
जौ लौं मदनगुपाल न देखैं, बिरह जरावत छाती ॥
निमिष निमिष मोहि बिरसत नाहीं, सरद जुहाई राती ।
पीर हमारी जानत नाहीं, तुम हौ स्याम सँघाती ॥
यह पाती लै जाहु मधुपुरी, जहँ वै बसैं सुजाती ।
मन जु हमारे उहाँ लै गए, काम कठिन सर घाती ॥
सूरदास प्रभु कहा चहत हैं, कोटिक बात सुहाती ।
एक बेर मुख बहुरि दिखावहु, रहैं चरन रज-राती ॥9॥

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on Fandom

Random Wiki