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उस प्रभात, तू बात न माने, / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


उस प्रभात, तू बात न माने,

तोड़ कुन्द कलियाँ ले आई,

फिर उनकी पंखड़ियाँ तोड़ीं

पर न वहाँ तेरी छवि पाई,


कलियों का यम मुझ में धाया

तब साजन क्यों दौड़ न आया?


फिर पंखड़ियाँ ऊग उठीं वे

फूल उठी, मेरे वनमाली!

कैसे, कितने हार बनाती

फूल उठी जब डाली-डाली!


सूत्र, सहारा, ढूँढं न पाया

तू, साजन, क्यों दौड़ न आया?


दो-दो हाथ तुम्हारे मेरे

प्रथम `हार' के हार बनाकर,

मेरी `हारों' की वन माला

फूल उठी तुझको पहिनाकर,


पर तू था सपनों पर छाया

तू साजन, क्यों दौड़ न आया?


दौड़ी मैं, तू भाग न जाये,

डालूँ गलबहियों की माला

फूल उठी साँसों की धुन पर

मेरी `हार', कि तेरी `माला'!


तू छुप गया, किसी ने गाया-

रे साजन, क्यों दौड़ न आया!


जी की माल, सुगंध नेह की

सूख गई, उड़ गई, कि तब तू

दूलह बना; दौड़कर बोला

पहिना दो सूखी वनमाला।

मैं तो होश समेट न पाई

तेरी स्मृति में प्राण छुपाया,

युग बोला, तू अमर तस्र्ण है

मति ने स्मृति आँचल सरकाया,


जी में खोजा, तुझे न

तू साजन, क्यों दौड़ न आया?

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