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एक दिन हंसी-हंसी में / केदारनाथ सिंह

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रचनाकार: केदारनाथ सिंह

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एक दिन

हंसी-हंसी में

उसने पृथ्वी पर खींच दी

एक गोल-सी लकीर

और कहा-- 'यह तुम्हारा घर है'

मैंने कहा--

'ठीक, अब मैं यहीं रहूंगा'


वर्षा

शीत

और घाम से बचकर

कुछ दिन मैं रहा

उसी घर में


इस बात को बहुत दिन हुए


लेकिन तब से वह घर

मेरे साथ-साथ है

मैंने आनेवाली ठण्ड के विरुद्ध

उसे एक हल्के रंगीन स्वेटर की तरह

पहन रखा है


'अकाल में सारस' नामक कविता-संग्रह से

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