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लेखक: श्यामल सुमन

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मेरे मालिक तू बता दे, क्यों बना ऐसा जहाँ।
सच को लाओ सामने तो, दुश्मनी होती यहाँ।।

ख्वाब बचपन में जो देखा, वो अधूरा रह गया।
अनवरत जीने की खातिर, दे रहा हूँ इम्तहाँ।।

मुतमइन कैसे रहूँ जब, घर पडोसी का जले।
है फरिश्ता दूर में अब, आदमी मिलता कहाँ।।

हर कोई बेताब अपनी, बात कहने के लिए।
सोच की धरती अलग पर, सब दिखाता आसमां।।

गम नहीं इस बात का कि, लोग भटके राह में।
हो अगर एहसास जिन्दा, छोड जायेगा निशाँ।।

मुश्किलों से भागने की, अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो, जल उठेगी खुद शमां।।

मिलती है खुशबू सुमन को, रोज अब खैरात में।
जो फकीरी में लुटाते, अब यहाँ फिर कल वहाँ।।

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