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औरत हूँ, ताकतवर भी,कमजोर भी / तारा सिंह

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रचनाकार: तारा सिंह

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औरत हूँ, ताकतवर भी, कमजोर भी
कभी मैं स्वयं कुरबान हो जाती हूँ
कभी मेरी कुरबानी जबरन ली जाती है
मेरी कुरबानी सदा नदारद ही जाती है
कुरबानी मेरी फितरत जो है
निस्वार्थ कुरबानी मेरी ताकत है
और यही मेरी कमजोरी भी है
बेटे के लिए दूध में मिसरी और
बेटी के हाथों पर रोटी-
नमक धरनेवाली मैं ही हूँ
सास बनकर बहू को खड़ी-खोटी
सुनानेवाली भी मैं ही हूँ
और बहू बनकर सास को जहर
देनेवाली औरत भी मैं ही हूँ
यही मेरी ताकत है और कमजोरी भी
मेरा अपना आपा कुछ नहीं है
समाज, संस्कार और संस्कृति
यही मेरा वजूद है
मेरी पैदाइश ही अशुभ और बोझ है
मेरी आँखों से आँसू की जगह खून टपकता है
तब भी मैं उफ तक नहीं करती हूँ
यही मेरी ताकत है और कमजोरी भी
पसीमा की तरह मेरी आँखों से
अविरल आँसू झरते रहते हैं
फिर भी कोयल की तरह मेरी
जुबान मीठी है और मधुर भी
अखंड पवित्रता पर दाग न लगे
स्वयं अपनी हाथों अपनी चिता
सजानेवाली पद्मिनी भी मैं ही हूँ
यही मेरी ताकत है और कमजोरी भी
मेरी अपनी कोई पहचान नहीं
मेरे शरीर के हजार टुकड़े हैं
किन-किन को गिनाऊँ, बस
यूँ समझ लो कि इस दुनिया को
रचनेवाली देवी मैं ही हूँ
और मिटानेवाली भी मैं ही हूँ
यही मेरी ताकत है और कमजोरी भी

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