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कवि: सूरदास


राग बिलावल


कब तुम मोसो पतित उधारो।

पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥

बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजमिल कौन बिचारो।

भाजै नरक नाम सुनि मेरो, जमनि दियो हठि तारो॥

छुद्र पतित तुम तारि रमापति, जिय जु करौ जनि गारो।

सूर, पतित कों ठौर कहूं नहिं, है हरि नाम सहारो॥



भावार्थ :- जो पुण्य करता है, वह स्वर्ग पद पाता है। मैंने कोई पुण्य नहीं किया, इससे स्वर्ग जाने का तो मेरा अधिकार है नहीं। अब रह गया नरक। मगर नरक भी मेरे महान पापों को देखकर डर गया है। वहां भी प्रवेश नहीं। अब कहां जाऊं। अब तो, नाथ, तुम्हारे चरणों का ही अवलम्ब है, सो वहीं थोड़ी-सी जगह कृपाकर दे दो।

शब्दार्थ :- मोसो =मेरे समान। पावन =पवित्र करने वाला। पासंगहुं =पासंग भी। अजमिल = भक्त अजामिल, जो लड़के का `नारायण' नाम लेने से यम पाश से मुक्त हो गया था। बिचारो = बेचारा। भाजै =भागता है। जमनि =यमदूतों ने। हठी =जबरदस्ती से। तारो =ताला। गारो =बड़ाई, अभिमान। ठौर जगह।

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