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कवि: कमलेश भट्ट कमल

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कभी सुख का समय बीता, कभी दुख का समय गुजरा

अभी तक जैसा भी गुजरा मगर अच्छा समय गुजरा !


अभी कल ही तो बचपन था अभी कल ही जवानी थी

कहाँ लगता है इन आँखों से ही इतना समय गुजरा !


बहुत कोशिश भी की, मुट्ठी में पर कितना पकड़ पाए

हमारे सामने होकर ही यूँ सारा समय गुजरा !


झपकना पलकों का आँखों का सोना भी जरूरी है

हमेशा जागती आँखों से ही किसका समय गुजरा !


उन्हीं पेडों पे फिर से आ गए कितने नए पत्ते

उन्हीं से जैसे ही पतझार का रूठा समय गुजरा !


हमें भी उम्र की इस यात्रा के बाद लगता है

न जाने कैसे कामों में यहाँ अपना समय गुजरा !

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