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रचनाकार: सैयद इंशा अल्ला खाँ 'इंशा'

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कमर बाँधे हुए चलने को यां सब यार बैठे हैं
बहुत आगे गये, बाक़ी जो हैं तय्यार बैठे हैं

न छेड़ ऐ निकहते-बादे-बहारीं, राह लग अपनी
तुझे अठखेलियाँ सूझी हैं, हम बेज़ार बैठे हैं

ख़याल उन का परे है अर्श-ए-आज़म से कहीं साक़ी
गरज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मैख़्वार बैठे हैं

बसाने नक़्श-ए-पा-ए-रहरवाँ कू-ए-तमन्ना में
नहीं उठने की ताक़त क्या करें लाचार बैठे हैं

कहें हैं सब्र किस को आह नंग-ओ-नाम है क्या शै
गरज़ रो पीटकर इन सब को हम यकबार बैठे हैं

कहीं बोसे की मत जुर्रत दिला! कर बैठियो उन से
अभी इस हद को वो कैफ़ी नहीं, होशियार बैठे हैं

नजीबों का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारों
जिसे पूछो यही कहते हैं हम बेकार बैठे हैं

नई यह वज़'अ शर्माने की सीखी आज है तुम ने
हमारे पास साहब वरना यूँ सौ बार बैठे हैं

कहाँ गर्दिश फ़लक की चैन देती है सुना 'इंशा'
ग़नीमत है कि हम-सूरत यहाँ दो चार बैठे हैं

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