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कवि गगन विहारी / अनिल जनविजय

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CHANDER


कैसे नरपिशाच हैं कवि गगन विहारी ।

लाल रक्त की प्यास हैं कवि गगन विहारी ॥


राम नाम वे लुटा रहे, लूट सके तो लूट ।

हि्न्दू जन का विश्वास हैं कवि गगन विहारी ॥


धर्म की ध्वजा उठाए, रक्तपात में लीन ।

जटाधारी की आस हैं कवि गगन विहारी ॥


साम्प्रदायिक विद्वेष बना है संस्कृति का सार ।

तिमिर में प्रकाश हैं कवि गगन विहारी ॥


महाकाल के साथ वे घूमें, ले हिंसा उन्माद ।

जीवन का उच्छवास हैं कवि गगन विहारी ॥


हिन्दू मुस्लिम एकता की बातें बड़ी बड़ी ।

पर मुस्लिमों की लाश हैं कवि गगन विहारी ॥


धर्म ही अब देश हो गया, विधर्मी देशद्रोही ।

भारत का संत्रास हैं कवि गगन विहारी ॥


(2003)

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