पुराने अवतरण Report a problem
पन्ना बदलें संवाद

कितने आसान सबके सफर हो गए / विजय वाते

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे!   दो वर्ष की उपलब्धियाँ    |     रचनाकारों की टिप्पणियाँ    |     अपनी टिप्पणी दीजिये


 रचनाकार: विजय वाते                 

कितने आसान सबके सफर हो गए ।
रेत पर नाम लिख कर अमर हो गए ।

ये जो कुर्सी मिली, क्‍या करिश्‍मा हुआ ।
अब तो दुश्‍मन भी लख्‍तेजिगर हो गए ।

सॉंप-सीढी का ये खेल भी खूब है ।
वो जो नब्‍बे थे, बिल्‍कुल सिफर हो गए ।

एक लानत, मलामत मुसीबत बला ।
तेग लकडी की थी, सौ गदर हो गए ।

सबके चेहरे पर इक सनसनी की खबर ।
जैसे अखबार वैसे शहर हो गए ।

ये शिकायत जहाजों की है आजकल ।
उथले तालाब भी अब बहर हो गए

Rate this article:

Share this article:

Hubs Highlights International Sites Wikia messages
Entertainment
Gaming
Cartoons & Comics
Science Fiction
Hobbies
Sports
See all...
German
Spanish
Chinese
Japanese
More...
Wikia is hiring for several open positions
Send this article to a friend
"कितने आसान सबके सफर हो गए / विजय वाते"
 
 
Hi!

I thought you'd like this page from Wikia!

http://hi.literature.wikia.com

Come check it out!
Send confirmation


.