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CHANDER

की वफ़ा हमसे तो ग़ैर उसे जफ़ा कहते हैं
होती आई है के अच्छों को बुरा कहते हैं

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उन से
कहने जाते तो हैं, पर देखिये क्या कहते हैं

अगले वक़्तों के हैं ये लोग, इन्हें कुछ न कहो
जो मय-ओ-नग़्में को अंदोहरूबा कहते हैं

दिल में आ जाए है, होती है जो फ़ुर्सत ग़श से
और फिर कौन से नाले को रसा कहते हैं?

है पर-ए-सरहद-ए-इदराक से अपना मस्जूद
क़िब्ले को, अहल-ए-नज़र, क़िब्लानुमा कहते हैं

पा-ए-अफ़गार पे जब से तुझे रहम आया है
ख़ार-ए-राह को तेरे हम मेह्र-ए-गिया कहते हैं

इक शरर दिल में है, उस से कोई घबरायेगा क्या
आग मतलूब है हमको, जो हवा कहते हैं

देखिये लाती है उस शोख़ की नख़्वत क्या रंग
उस की हर बात पे हम नाम-ए-ख़ुदा कहते हैं

वहशत-ओ-शेफ़्ता अब मर्सिया कहें शायद
मर गया "ग़लिब"-ए-आशुफ़्तानवा कहते हैं

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