कुमार विश्वास
विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है,
मैं तुझसे दूर कैसा हुँ तू मुझसे दूर कैसी है
ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है !!!
समुँदर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता
ये आसुँ प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता ,
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता !!!
मुहब्बत एक एहसानों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है,
यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूँ हैं
जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है !!!
भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हँगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब पला बैठा तो हँगामा,
अभी तक डूब कर सुनते थे हम किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हँगामा !!!
Sunday, August 19, 2007
डॉ. कुमार विश्वास
जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है,
जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है.
झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर,
तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है.
जो धरती से अम्बर जोड़े , उसका नाम मोहब्बत है , जो शीशे से पत्थर तोड़े , उसका नाम मोहब्बत है , कतरा कतरा सागर तक तो ,जाती है हर उमर मगर , बहता दरिया वापस मोड़े , उसका नाम मोहब्बत है .
पनाहों में जो आया हो, तो उस पर वार क्या करना ? जो दिल हारा हुआ हो, उस पे फिर अधिकार क्या करना ? मुहब्बत का मज़ा तो डूबने की कशमकश में हैं, जो हो मालूम गहराई, तो दरिया पार क्या करना ?
बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन, मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तनचंदन, इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है, एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन.
तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ, तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ, तुम्हे मै भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नही लेकिन, तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ
-- डॉक्टर कुमार विश्वास
शायद हम लोगो ने कॉलेज के तृतीय वर्ष में प्रवेष किया होगा, कि किसी के पास एक सी. डी. आयी और देखते ही देखते सारे कॉलेज में छा गयी. आईटी. बीएचयू. के वार्षिकोत्सव " मिराज़ " की इस रिकॉर्डिंग ने सारे कॉलेज को हिन्दी कविता के बुखार में जकड़ लिया. उन दिनों एक अज़ीब सी मस्ती छायी थी. सभी को गुनगुनाते हुये सुना जा सकता था. हर रूम पे यही सी. डी. चल रही होती थी.
ये जादू था डा. कुमार विश्वास का जो आज भी मेरे और मेरे दोस्तों के सर चड़्कर बोलता है. आज भी कभी जब मन उदासी की और बढ़ रहा होता है, तो मेरे पास सबसे आसान विकल्प होता है, कुमार विश्वास की कुछ पंक्तियाँ सुन लेना.
डा. विश्वास रचित कुछ मुक्तक.,
रंग दुनिया ने दिखाया है निराला, देखूँ, है अँधेरे में उजाला, तो उजाला देखूँ आईना रख दे मेरे हाथ में,आख़िर मैं भी, कैसा लगता है तेरा चाहने वाला देखूँ जिसके आँगन से खुले थे मेरे सारे रस्ते, उस हवेली पे भला कैसे मैं ताला देखूँ
हर एक नदिया के होंठों पे समंदर का तराना है, यहाँ फरहाद के आगे सदा कोई बहाना है वही बातें पुरानी थी, वही किस्सा पुराना है, तुम्हारे और मेरे बीच में फिर से ज़माना है
भ्रमर कोई कुमुदनी पे मचल बैठा तो हंगामा , हमारे दिल में कोई ख़्वाब पल बैठा तो हंगामा अभी तक डूब के सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का , मैं किस्से को हक़ीकत में बदल बैठा तो हंगामा -
बहुत बिखरा, बहुत टूटा, थपेडे़ सह नही पाया , हवाओं के इशारों पे मगर मैं बह नहीं पाया अधूरा अनसुना ही रह गया यूँ प्यार का किस्सा , कभी तुम सुन नही पाए, कभी मैं सुन नही पाया
कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है , मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है , ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है
--डॉक्टर कुमार विश्वास
written by Dr. Kumar Vishvas
