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कुररी के प्रति / मुकुटधर पांडेय

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कवि: मुकुटधर पांडेय

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बता मुझे ऐ विहग विदेशी अपने जी की बात

पिछड़ा था तू कहाँ, आ रहा जो कर इतनी रात

निद्रा में जा पड़े कभी के ग्राम-मनुज स्वच्छंद

अन्य विहग भी निज नीड़ों में सोते हैं सानन्द

इस नीरव घटिका में उड़ता है तू चिन्तित गात

पिछड़ा था तू कहाँ, हुई क्यों तुझको इतनी रात ?


देख किसी माया प्रान्तर का चित्रित चारु दुकूल ?

क्या तेरा मन मोहजाल में गया कहीं था भूल ?

क्या उसका सौन्दर्य-सुरा से उठा हृदय तव ऊब ?

या आशा की मरीचिका से छला गया तू खूब ?

या होकर दिग्भ्रान्त लिया था तूने पथ प्रतिकूल ?

किसी प्रलोभन में पड़ अथवा गया कहीं था भूल ?


अन्तरिक्ष में करता है तू क्यों अनवरत बिलाप ?

ऐसी दारुण व्यथा तुझे क्या है किसका परिताप ?

किसी गुप्त दुष्कृति की स्मृति क्या उठी हृदय में जाग

जला रही है तुझको अथवा प्रिय वियोग की आग ?

शून्य गगन में कौन सुनेगा तेरा विपुल विलाप ?

बता कौन सी व्यथा तुझे है, है किसका परिताप ?


यह ज्योत्सना रजनी हर सकती क्या तेरा न विषाद ?

या तुझको निज-जन्मभूमि की सता रही है याद ?

विमल व्योम में टँगे मनोहर मणियों के ये दीप

इन्द्रजाल तू उन्हें समझ कर जाता है न समीप

यह कैसा भय-मय विभ्रम है कैसा यह उन्माद ?

नहीं ठहरता तू, आई क्या तुझे गेह की याद ?


कितनी दूर कहाँ किस दिशि में तेरा नित्य निवास

विहग विदेशी आने का क्यों किया यहाँ आयास

वहाँ कौन नक्षत्र–वृन्द करता आलोक प्रदान ?

गाती है तटिनी उस भू की बता कौन सा गान ?

कैसा स्निग्ध समीरण चलता कैसी वहाँ सुवास

किया यहाँ आने का तूने कैसे यह आयास ?

(सरस्वती, जुलाई, 1920)

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