FANDOM

१२,२६२ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng.png
































CHANDER


काहे कौं कहि गए आइहैं, काहैं झूठी सौ हैं खाए ।

ऐसे मैं नहिं जाने तुमकौं, जे गुन करि तुम प्रगट दिखाए ।

भली करी यह दरसन दीन्हे, जनम जनम के ताप नसाए ।

तब चितए हरि नैंकु तिया-तन, इतनैहि सब अपराध समाए ॥

सूरदास सुंदरी सयानी, हँसि लीन्हें पिय अंकम लाए ॥1॥


धीर धरहु फल पावहुगे ।

अपनेहीं सुख के पिय चाँड़े, कबहूँ तौ बस आवहुगे ॥

हम सौं कहत और की औरै, इन बातनि मन भावहुगे ।

कबहूँ राधिका मान करैगी, अंतर बिरह जनावहुगे ॥

तब चरित्र हमहीं देखैंगी, जैसें नाच नचावहुगे ।

सूर स्याम अति चतुर कहावत, चतुराई बिसरावहुगे ॥2॥


मैं हरि सौं हो मान कियौ री ।

आवत देखि आन बनिता-रत, द्वार कपाट दियौ री ॥

अपनैं हीं कर साँकर सारी, संधिहिं संधि सियौ री ॥

जौ देखौं तौ सेज सुमूरति, काँप्यौ रिसनि हियौ री ॥

जब झुकि चली भवन तैं बाहरि, तव हठि लौटि लियौ री ।

कहा कहौं कछु कहत न आवे, तहँ गोविंद बियौ री ।

बिसरि गई सब रोष, हरष मन, पुनि करि मदन जियौ री ॥

सूरदास प्रभु अति रति नागर, छल मुख अमृत पियौ री ॥3॥


नंद-नँदन सुखदायक हैं ।

नैन सैन दै हरत नारि मन, काम काम-तनु दायक हैं ॥

कबहूँ रैनि बसत काहू कैं, कबहूँ भोर उठि आवत हैं ।

काहू कौ मन आपु चुरावत, काहू कैं मन भावत हैं ॥

काहू कैं जागत सगरी निसि, काहूँ विरह जगावत हैं ।

सुनहु सूर जोइ जोइ मन भावै, सोइ सोइ रँग उपजावत हैं ॥4॥


नाना रँग उपजावत स्याम । कोउ रीझति, कोउ खीझति बाम ।

काहू कैँ निसि बसत बनाइ । काहू मुख छुवै आवत जाइ ।

बहु नायक ह्वै बिलसत आपु । जाकौ सिव पावत नाहिं जापु ।

ताकौं ब्रजनारी पति जानैं । कोउ आदरैं, कोउ अपमानैं ।

काहु सौं कहि आवन साँझ । रहत और नागरि घर माँझ ।

कबहुँ रैन सब संग बिहात । सुनहु सूर ऐसे नँद-तात ॥5॥


अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम ।

अरस-परस सबहिनि यह जानी, हरि लुब्धे सबहिनि कैं धाम ॥

जा दिन जाकैं भवन न आवत, सो मन मैं यह करति बिचार ।

आजु गए औरहिं काहू कै, रिस पावति, कहि बड़े लबार ॥

यह लीला हरि कैं मन भावत, खंडित बचन कहत सुख होत ।

साँझ बोल दै जात सूर-प्रभु, ताकैं आवत होत उदोत ॥6॥


राधिका गेह हरि-देह-बासी । और तिय धरनि धर तनु-प्रकासी ॥

ब्रह्म पूरन द्वितीय नहीं कोऊ । राधिका सबै हरि सबै वोऊ ।

दीप सौं दीप जैसैं उजारी । तैसें ही ब्रह्म घर-घर बिहारी ॥

खंडित बचन हित यह उपाई । कबहुँ कहुँ जात, कहु नहिं कन्हाई ।

जन्म कौ सुफल हरि यहै पावैं । नारि रस-वचन स्रवननि सुनावैं ॥

सूर-प्रभु अनतहीं गमन कीन्हौं । तहाँ नहिं गए जहँ बचन दीन्हौ ॥7॥

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki