पुराने अवतरण Report a problem
पन्ना बदलें संवाद

ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ / मजरूह सुल्तानपुरी

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे!   दो वर्ष की उपलब्धियाँ    |     रचनाकारों की टिप्पणियाँ    |     अपनी टिप्पणी दीजिये


 रचनाकार: मजरूह सुल्तानपुरी                 

ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
दम के दम में अफ़साना थी मेरी तबाही भी

इल्तफ़ात समझूँ या बेरुख़ी कहूँ इस को
रह गैइ ख़लिश बन कर उसकी कमनिगाही भी

याद कर वो दिन जिस दिन तेरी सख़्त्गीरी पर
अश्क भर के उठी थी मेरी बेगुनाही भी

शम भी उजाला भी मैं ही अपनी महफ़िल का
मैं ही अपनी मंज़िल का राहबर भी राही भी

गुम्बदों से पलटी है अपनी ही सदा "मजरूह"
मस्जिदों में की जाके मैं ने दादख़्वाही भी

Rate this article:

Share this article:

Hubs Highlights International Sites Wikia messages
Entertainment
Gaming
Cartoons & Comics
Science Fiction
Hobbies
Sports
See all...
German
Spanish
Chinese
Japanese
More...
Wikia is hiring for several open positions
Send this article to a friend
"ख़त्म-ए-शोर-ए-तूफ़ाँ / मजरूह सुल्तानपुरी"
 
 
Hi!

I thought you'd like this page from Wikia!

http://hi.literature.wikia.com

Come check it out!
Send confirmation


.