Fandom

Hindi Literature

गहे अँगुरियाँ ललन की, नँद चलन सिखावत / सूरदास

१२,२६१pages on
this wiki
Add New Page
Talk0 Share
http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng.png
































CHANDER

गहे अँगुरियाँ ललन की, नँद चलन सिखावत ।
अरबराइ गिरि परत हैं, कर टेकि उठावत ॥
बार-बार बकि स्याम सौं कछु बोल बुलावत ।
दुहुँघाँ द्वै दँतुली भई, मुख अति छबि पावत ॥
कबहुँ कान्ह-कर छाँड़ि नँद, पग द्वैक रिंगावत ।
कबहुँ धरनि पर बैठि कै, मन मैं कछु गावत ॥
कबहुँ उलटि चलैं धाम कौं, घुटुरुनि करि धावत ।
सूर स्याम-मुख लखि महर, मन हरष बढ़ावत ॥

भावार्थ :-- श्रीनन्द जी अपने लाल की अँगुली पकड़कर उन्हें चलना सिखला रहे हैं ।(श्याम) लड़खड़ाकर गिर पड़ते हैं, तब हाथ का सहारा देकर उन्हें उठाते हैं, बार-बार श्याम से कुछ कहकर उनसे भी कुछ बुलवाते हैं । मोहन के (मुख में) दोनों ओर ऊपर-नीचे दो-दो दँतुलियाँ (छोटे दाँत) निकल आयी हैं, इससे उनका मुख अत्यन्त शोभित हो रहा है । कभी कन्हाई श्रीनन्द जी का हाथ छोड़कर दो पद चलता है, कभी पृथ्वी पर बैठकर मन-ही-मन कुछ गाता है । कभी मुड़कर घुटनों के बल भागता घर के भीतर की ओर चलपड़ता है । सूरदास जी कहते हैं कि श्यामसुन्दर का मुख देख-देखकर व्रजराज के हृदय में आनन्द बढ़ता जाता है ।

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on Fandom

Random Wiki