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गाँव से घर निकलना है / यश मालवीय

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CHANDER

कुछ न होगा तैश से या सिर्फ़ तेवर से,

चल रही है, प्यास की बातें समन्दर से ।



रोशनी के काफ़िले भी भ्रम सिरजते हैं,

स्वर आगर ख़ामोश हो तो और बजते हैं,

अब निकलना ही पड़ेगा, गाँव से- घर से



एक सी शुभचिंतकों की शक्ल लगती है,

रात सोती है हमारी नींद जगती है,

जानिए तो सत्य भीतर और बाहर से ।


जोहती है बाट आँखें घाव बहता है,

हर कथानक आदमी की बात कहता है,

किसलिए सिर भाटिए दिन- रात पत्थर से ।

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