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गाली में गरिमा घोल-घोल / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~


गाली में गरिमा घोल-घोल

क्यों बढ़ा लिया यह नेह-तोल


कितने मीठे, कितने प्यारे

अर्पण के अनजाने विरोध

कैसे नारद के भक्ति-सूत्र

आ गये कुंज-वन शोध-शोध!


हिल उठे झूलने भरे झोल

गाली में गरिमा घोल-घोल।


जब बेढंगे हो उठे द्वार

जब बे काबू हो उठा ज्वार

इसने जिस दिन घनश्याम कहा

वह बोल उठा परवर-दिगार।


मणियों का भी क्या बने मोल।

गाली में गरिमा घोल-घोल।


ये बोले इनका मृदुल हास्य

वे कहें कि उनके मृदुल बोल

भूगोल चुटकियाँ देता है

वह नाच-नाच उट्टा खगोल।


कुछ तो अपने फरफन्द खोल

गाली में गरिमा घोल-घोल।।

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