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CHANDER


ग्वारनि कही ऐसी जाइ ।
भए हरि मधुपुरी राजा, बड़े बंस कहाइ ॥
सूत मागध बदत बिरदनि, बरनि बसुद्यौ तात ।
राज-भूषन अंग भ्राजत, अहिर कहत लजात ॥
मातु पितु बसुदेव दैवै, नंद जसुमति नाहिं ।
यह सुनत जल नैन ढारत, मींजि कर पछिताहिं ॥
मिली कुबिजा मलै लै कै, सो भई अरधंग ।
सूरप्रभु बस भए ताकैं, करत नाना रंग ॥1॥

कैसै री यह हरि करिहैं ।
राधा कौं तजिहै मनमोहन, कहा कंस दासी धरिहैं ॥
कहा कहति वह भइ पटरानी, वै राजा भए जाइ उहाँ ।
मथुरा बसत लखत नहिं कोऊ, को आयौ, को रहत कहाँ ॥
लाज बेंचि कूबरी बिसाहो, संग न छाँड़ति एक घरी ।
सूर जाहि परतीति न काहू, मन सिहात यह करनि करी ॥2॥

कुबिजा नहिं तुम देखी है ।
दधी बेचन जब जाति मधुपुरी, मैं नीकैं करि पेषी है ॥
महल निकट माली की बेटी, देखत जिहिं नर-नारि हँसै ।
कोटि बार पीतरि जौ दाहौ, कोटि बार जो कहा कसैं ॥
सुनियत ताहि सुंदरी कीन्ही, आपु भए ताकौं राजी ।
सूर मलै मन जाहि जाहि सौं, ताकौ कहा करै काजी ॥3॥

कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ ।
ए अहीर वह दासी पुर की, बिधिना जोरी भली मिलाइ ॥
ऐसेन कौं मुख नाउँ न लीजै, कहा करौं कहि आवत मोहिं ।
स्यामहिं दोष किधौं कुबिजा कौ, यहै कहो मैं बूझति तोहि ।
स्यामहिं दोष कहा कुबिजा कौ, चेरी चपल नगर उपहास ।
टेढ़ी टेकि चलति पग धरनी, यह जानै दुख सूरजदास ॥4॥

कंस बध्यौ कुबिजा कैं काज ।
और नारि हरि कौं न मिली कहूँ, कहा गँवाई लाज ॥
जैसैं काग हँस की संगति, लहसुन संग कपूर ।
जैसैं कंचन काँच बराबरि, गेरू काम सिंदूर ॥
भोजन साथ सूद्र बाम्हन के, तैसौ उनकौ साथ ।
सुनहु सूर हरि गाइ चरैया, अब भए कुबिजानाथ ॥5॥

वै कह जानैं पीर पराई ।
सुंदर स्याम कमल-दल लोचन, हरि हलधर के भाई ॥
मुख मुरली सिर मोर पखौवा, बन बन धेनु चराई ।
जे जमुना जल, रंग रँगे हैं, अजहुँ न तजत कराई ॥
वहई देखि कूबरी भूले, हम सब गईं बिसराई ।
सूरज चातक बूँद भई है, हेरत रहे हिराई ॥6॥

तब तैं मिटे सब आनंद ।
या ब्रज के सब भाग संपदा, लै जु गए नँदनंद ॥
बिह्वल भई जसोदा डोलति, दुखित नंद उपनंद ।
धेनु नहीं पय स्रवतिं रुचिर मुख, चरतिं नहीं तृण कंध ॥
बिषम बियोग दहत उर सजनी, बाढ़ि रहे दुख दंद ।
सीतल कौन करै री माई, नाहि इहाँ ब्रजचंद ॥
रथ चढ़ि चले गहे नहिं काहू, चाहि रहीं मतिमंद ।
सूरदास अब कौन छुड़ावै, परे बिरह कैं फंद ॥7॥

इक दिन नंद चलाई बात ।
कहत सुनत गुन रामकृष्ण कै, ह्वै आयौ परभात ॥
वैसैंहि भोर भयौ जसुमति कौ, लोचन जल न समात ।
सुमिरि सनेह बिहरि उर अंतर, ढरि आवत ढरि जात ।
जद्यपि वै बसुदेव देवकी, हैं निज जननी तात ।
बार एक मिलि जाहु सूर प्रभु, धाई हू कैं नात ॥8॥

चूक परी हरि की सेवकाई ।
यह अपराध कहाँ लौं बरनौं,कहि कहि नंद महर पछिताई ॥
कोमल चरन-कमल कंटक कुस, हम उन पै बन गाइ चराई ।
रंचक दधि के काज जसोदा, बाँधे कान्ह उलूषल लाई ॥
इंद्र-प्रकोप जानि ब्रज राखे, बरुन फांस तैं मोहिं मुकराई ।
अपने तन-धन-लोभ, कंस-डर, आगैं कै दीन्हे दोउ भाई ॥
निकट बसत कबहूँ न मिलि आयौ, इते मान मेरी निठुराई ।
सूर अजहुँ नातौ मानत हैं, प्रेम सहित करैं नंद-दुहाई ॥9॥

लै आवहु गोकुल गोपालहिं ।
पाइँनि परि क्यौं हूँ बिनती करि, छल बल बाहु बिसालहिं ॥
अब की बार नैंकु दिखरावहु, नंद आपने लालहिं ।
गाइनि गनत ग्वार गोसुत सँग, सिखवत बैन रसालहिं ॥
जद्यपि महाराज सुख संपति, कौन गनै मनि लालहिं ।
तदपि सूर वै छिन न तजत हैं, वा घुँघची की मालहिं ॥10॥

हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं ।
दासी ह्वै बसुदेव राइ की, दरसन देखत रैहौं ॥
राखि एते दिवसनि मोहिं, कहा कियौ तुम नीकौ ।
सोऊ तौ अक्रूर गए लै, तनक खिलौना जी कौ ।
मोहि देखि कै लोग हसैंगे, अरु किन कान्ह हँसै ।
सूर असीस जाइ देहौं, जनि न्हातहु बार खसै ॥11॥

पंथी इतनी कहियौ बात ।
तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात ॥
बकी अघाशुर टरत न टारे, बालक बनहिं न जात ।
ब्रज पिंजरी रुधि मानौ राखे, निकसन कौं अकुलात ॥
गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात ।
परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिं अवलंबैं तात ॥
कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत ।
यह व्यवहार आजु लौं हैं ब्रज, कपट नाट छल ठानत ॥
दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट ।
आँखनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट ।
ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकहीं पेट ।
सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ॥12॥

सँदेसौ देवकी सौं कहियौ ।
हौं तौ धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ ॥
जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै ।
प्रात होत मेरे लाल लड़ैतें, माखन रोटी भावै ॥
तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते ।
जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते ॥
सूर पथिक सुनि मोहिं रैनि दिन बढ़यौ रहत उर सोच ।
मेरो अलक लड़ैतो मोहन; ह्वै है करत सँकोच ॥13॥

मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ वैसेहिं धर्‌यौ रहे ।
को उठि प्रात होत ले माखन, को कर नेति गहै ॥
सूने भवन जसोदा सुत के, गुन गुनि सूल सहै ।
दिन उठि घर घेरत ही ग्वारिनि, उरहन कोउ न कहै ॥
जो ब्रजमैं आनंद हुतौ, मुनि मनसा हू न गहै ।
सूरदास स्वामी बिनु गोकुल, कौड़ी हू न लहै ॥14॥

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