FANDOM

१२,२६२ Pages

http://www.kavitakosh.orgKkmsgchng
































CHANDER

मौन संध्या का दिए टीक

रात

काली

आ गई

सामने ऊपर, उठाए हाथ-सा

पथ बढ गया ।


घेरने को दुर्ग की दीवार मानों-

अचल विंध्या पर

कुंडली खोली सिहरती चांदनी ने

पंचमी की रात ।

घूमता उत्तर दिशा को सघन पथ

संकेत में कुछ कह गया ।


चमकते तारे लजाते हैं

प्रेरणा का दुर्ग ।

पार पश्चिम के, क्षितिज के पार

अमित गंगाएँ बहाकर भी

प्राण का नभ धूल-धूसित है ।


भेद उषा ने दिए सब खोल

हृदय के कुल भाव,

रात्रि के, अनमोल ।

दु:ख कढ़ता सजल, झलमल ।

आँख मलता पूर्व-स्रोत ।


पुन:

पुन: जगती जोत ।


घित गया है समय का रथ कहीं ।

लालिमा से मढ़ गया है राग ।

भावना की तुंग लहरें

पंथ अपना, अंत अपना जान

रोलती हैं मुक्ति के उदगार ।


(१९४६ में लिखित)

Ad blocker interference detected!


Wikia is a free-to-use site that makes money from advertising. We have a modified experience for viewers using ad blockers

Wikia is not accessible if you’ve made further modifications. Remove the custom ad blocker rule(s) and the page will load as expected.

Also on FANDOM

Random Wiki