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जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है / मुनव्वर राना

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रचनाकारः मुनव्वर राना

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जब कभी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है

मां दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है


रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूं

रोज़ उंगली मिरी तेज़ाब में आ जाती है


दिल की गलियों से तिरी याद निकलती ही नहीं

सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है


रात भर जागते रहने का सिला है शायद

तेरी तस्वीर-सी महताब में आ जाती है


एक कमरे में बसर करता है सारा कुनबा

सारी दुनिया दिले- बेताब में आ जाती है


ज़िन्दगी तू भी भिखारिन की रिदा ओढ़े हुए

कूचा - ए - रेशमो - किमख़्वाब में आ जाती है


दुख किसी का हो छलक उठती हैं मेरी आँखें

सारी मिट्टी मिरे तालाब में आ जाती है


महताब=चांद; रिदा= चादर

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