पुराने अवतरण Report a problem
पन्ना बदलें संवाद

जब यह दीप थके / महादेवी वर्मा

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज

कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे!   दो वर्ष की उपलब्धियाँ    |     रचनाकारों की टिप्पणियाँ    |     अपनी टिप्पणी दीजिये


 रचनाकार: महादेवी वर्मा                 


जब यह दीप थके

महादेवी वर्मा

जब यह दीप थके तब आना।


यह चंचल सपने भोले है,

दृग-जल पर पाले मैने, मृदु

पलकों पर तोले हैं;

दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना!


साधें करुणा-अंक ढली है,

सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर

पावस की सजला बदली है;

विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!


यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,

सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,

ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;

दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!


यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के

चिर उज्जवल अक्षर जीवन की

बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;

कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!


लौ ने वर्ती को जाना है

वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने

रज का अंचल पहचाना है;

चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!

Rate this article:

Share this article:

Hubs Highlights International Sites Wikia messages
Entertainment
Gaming
Cartoons & Comics
Science Fiction
Hobbies
Sports
See all...
German
Spanish
Chinese
Japanese
More...
Wikia is hiring for several open positions
Send this article to a friend
"जब यह दीप थके / महादेवी वर्मा"
 
 
Hi!

I thought you'd like this page from Wikia!

http://hi.literature.wikia.com

Come check it out!
Send confirmation


.