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जब सूरज जग जाता है / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

From Hindi Literature

यहां जाईयें: नेविगेशन, ख़ोज
 

 रचनाकार: रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'                 

आँखें मलकर धीरे-धीरे


सूरज जब जग जाता है ।


सिर पर रखकर पाँव अँधेरा


चुपके से भग जाता है ।


हौले से मुस्कान बिखेरी


पात सुनहरे हो जाते ।


डाली-डाली फुदक-फुदक कर


सारे पंछी हैं गाते ।


थाल भरे मोती ले करके


धरती स्वागत करती है ।


नटखट किरणें वन-उपवन में


खूब चौंकड़ी भरती हैं ।


कल-कल बहती हुई नदी में


सूरज खूब नहाता है


कभी तैरता है लहरों पर


डुबकी कभी लगाता है ।

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