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जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी / शिवमंगल सिंह सुमन / भाग ३

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लेखक: शिवमंगल सिंह सुमन

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~

घिरी लंका के चारों ओर गहरा गूढ़ खाई थी
इन्हीं गड्ढों से महलों की गगनभेदी ऊँचाई थी
हज़ारों अस्मतों को लूटकर वह खिलखिलाता था
स्वयं सूरज तमस से तुप गया था, तिलमिलाता था

सभी भूखे थे नंगे थे, तबाही ही तबाही थी
मगर अन्याय का प्रतिरोध करने की मनाही थी
किसी ने न्याय माँगा तो समझ लो उसकी आफ़त थी
न जीने की इजाज़त थी न मरने की इजाज़त थी

धरा को क़ैद कर आराम से वह रह न सकता था
मनुज इस क्रूर शोषण को बहुत दिन सह न सकता था
स्वयं अन्याय ने पीड़ित दलित को ला जुटाया था
प्रवासी राम ने विद्रोह का बीड़ा उठाया था

नये संघर्ष की यह शक्ति धरती ने जगायी थी
किसी अवधेश या मिथिलेश की सेना न आयी थी
सुबह से शाम तक जो राक्षसी अन्याय सहते थे
जिन्हें सब जंगली हैवान बन्दर भालु कहते थे

नयी जनशक्ति की हर साँस से हुंकार उठती थी
प्रबल गतिरोध के विध्वंस की धधकार उठती थी
कि बर्बर राक्षसों का जंगली वीरों से पाला था
महीधर फाँद डाले थे समुन्दर बाँध डाला था

उधर थी संगठित सेना अनेकों यन्त्र दुर्धर थे
इधर हुंकारते हाथों में केवल पेड़-पत्थर थे
मगर था एक ही आदर्श जीने का जिलाने का
विगत जर्जर व्यवस्था को स्वयं मिटकर मिटाने का

नयी थी कामना, नवभावना, संदेश नूतन था
नयी थी प्रेरणा, नव कल्पना, परिवेश नूतन था
नया था मोल जीवन का विषमता ध्वंस करने का
नया था कौल मानव का, धरा को मुक्त करने का

चली क्या राम की सेना कि धरती बोल उठती थी
अखंडित शक्ति का भण्डार अपना खोल उठती थी
धरा की लाड़ली की जब अभय आशीष पायी थी
किसी हनुमान ने तब स्वर्ण की लंका जलायी थी

कँगूरे स्वर्ण-सौधों के धरा लुंठित दिखाते थे
नुकीले अस्त्र दुश्मन के निरे कुंठित दिखाते थे
अमन का शंख बजता था दमन की दाह होती थी
मनुज की दानवों को आज खुल करके चुनौती थी

विजय का बिगुल बजता था, अनय का नाश होता था
अँधेरा साँस गिनता था, सबेरा पास होता था
सिसकती रात के अंचल में रजनीचर बिलखते थे
उभरती उषा की गोदी में नव अंकुर किलकते थे

घड़ी अन्तिम समझ दनुकुल जले शोले गिराता था
प्रबल जनबल उन्हें फिर मोड़ उन पर ही फिराता था
नयी गंगा विषमता के कगारों को ढहाती थी
नयी धारा, नयी लहरें उसे समतल बनाती थी

युगों की साधना-सी राम ने जब शक्ति छोड़ी थी
किसी जर्जर व्यवस्था की विकट चट्टान तोड़ी थी
कटे सिर-सा पड़ा रावण धरा पर छटपटाता था
विगत युग मर्सिया गाता, नया युग गान गाता था

बहुत दिन बाद दलितों की हँसी की आज पारी थी
कि फिर से मुक्त था मानव कि फिर से मुक्त नारी थी
बँधी मुट्ठी दिखा जन-टोलियाँ जय-गान गाती थीं
कि नव निर्माण के जंगल में भी मंगल मनाती थी

धरा की लाड़ली प्रिय से लिपटने को ललकती थी
नयी कोंपल के होठों से, नयी कलिका किलकती थी
चपल चपला-सी आँखों में नयी आभा झलकती थी
सुधा के युगकटोरों से मदिर छलकन छलकती थी

सबेरे का भटकता शाम को घर लौट आया था
नयी उन्मुक्त जनता ने नया उत्सव मनाया था
छिनी धरती मिली फिर से नये सपने सँजोए थे
सभी ने खेत जोते थे सभी ने बीज बोए थे

घिरा काली घटाएँ थीं अमा की रात काली थी
मगर मानव-धरा के सम्मिलन की बात ही ऐसी निराली थी

अयोध्या में नये युग को बुलाने की बेहाली थी
कि जिसके साज स्वागत में सजी पहली दिवाली थी
धरा की लाड़ली ने स्वयं जिसकी ज्योति बाली थी
विकल सूखे हुए अधरों में नव मुस्कान ढाली थी

कि अस्त-व्यस्त तारों में नयी स्वर तान ढाली थी
धरा में स्वर्ग से बढ़कर सरसता थी, खुशहाली थी
वही पहला जनोत्सव था वही पहली दिवाली थी

लहलहाती जब धरा थी, शस्य-श्यामल
गुनगुनाती जब गिरा थी गीत कल-कल
छलछलाते स्नेह से जब पात्र छ्लछल
झलमलाते जब प्रभा के पर्व पल-पल

आज तुम दुहरा रहे हो प्रथा केवल
आज घर-घर में नहीं है स्नेह सम्बल
आज जन-जन में नहीं है ज्योति का बल
आज सूखी वर्त्तिका का सुलगता गुल
दीप बुझते जा रहे हैं विवश ढुल-ढुल

शेष खण्डहर में विगत युग की निशानी
सुन रहे हो स्वपन में जैसे कहानी
बन गई हो जिस तरह अपनी बिरानी

किंतु जन-जागृति धधकती जा रही है
जल उठेगी फिर नयी बाती सुहानी
जल रहे हैं दीप, जलती है जवानी

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