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ज़मीं पे फ़स्ल-ए-गुल आई फ़लक पर माहताब आया / शकील बँदायूनी

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CHANDER

रूह को तड़पा रही है उन की याद
दर्द बन कर छा रही है उन की याद

इश्क़ से घबरा रही है उन की याद्
रुकते रुकते आ रही है उन की याद

वो हँसे वो ज़ेर-ए-लब कुछ कह उठे
ख़्वाब से दिखला रही है उन की याद

मैं तो ख़ुद्दारी का क़ाइल हूँ मगर
क्या करूँ फिर आ रही है उन की याद

अब ख़्याल-ए-तर्क-ए-रब्त ज़ब्त ही से है
ख़ुद ब ख़ुद शर्मा रही है उन की याद

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