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जाके लिए घर आई घिघाय

विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से

लेखक: बिहारी

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जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ी

आजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ी

ता छिन तैं तिहिं भाँति अजौं, न हलै न चलै बिधि की लसी काढ़ी

वाहि गँवा छिनु वाही गली तिनु, वैसैहीं चाह (बै) वैसेही ठाढ़ी ।।