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जागना अपराध / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

जागना अपराध!

इस विजन बन गोद में सखि,

मुक्ति-बन्धन-मोद में सखि,

विष-प्रहार-प्रमोद में सखि,


मृदुल भावों

स्नेह दावों

अश्रु के अगणित अभावों का शिकारी-

आ गया विध व्याध;

जागना अपराध!

बंक वाली, भौंह काली,

मौत, यह अमरत्व ढाली,

कस्र्ण धन-सी,

तरल घन -सी

सिसकियों के सधन बन-सी,

श्याम-सी,

ताजे, कटे-से,

खेत-सी असहाय,

कौन पूछे?

पुस्र्ष या पशु

आय चाहे जाय,

खोलती सी जाय,

कसकर बाँधती वरदान-

पाप में-

कुछ आप खोती

आप में-

कुछ मान।

ध्यान में, घुन में,

हिये में, घाव में,

शर में,

आँख मूँदें,

ले रही विष को-

अमृत के भाव!

अचल पलक,

अचंचला पुतली

युगों के बीच,

दबी-सी,

उन तरल बूँदों से

कलेजा सींच,

खूब अपने से

लपेट-लपेट

परम अभाव,

चाव से बोली,

प्रलय की साध-

जागना अपराध!


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