जाग जाग सुकेशिनी री! / महादेवी वर्मा
From Hindi Literature
|
कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे! दो वर्ष की उपलब्धियाँ | रचनाकारों की टिप्पणियाँ | अपनी टिप्पणी दीजिये
|
|
रचनाकार: महादेवी वर्मा | |
|
संग्रह का मुखपृष्ठ: सांध्यगीत / महादेवी वर्मा |
जाग जाग सुकेशिनी री!
अनिल ने आ मृदुल हौले,
शिथिल वेणी-बन्ध खोले,
पर न तेरे पलक डोले,
बिखरती अलकें झरे जाते
सुमन परवेषिनी री!
छाँह में अस्तित्व खोये,
अश्रु से सब रंग धोये,
मन्दप्रभ दीपक सँजोये,
पन्थ जिसका देखती तू अलस
स्वप्न-निमेषिनी री!
रजत-तारों से घटा बुन,
गगन के चिर दाग गिन गिन,
श्रान्त जग के श्वास चुन चुन,
सो गई क्या नींद अज्ञात-
पथ-निर्देशिनी री?
दिवस की पद-चाप चंचल,
भ्रान्ति में सुधि सी मधुर चल,
आ रही है निकट प्रतिपल,
निमिष में होगा अरुण जग
ओ विराग-निवेषिनी री!
रूप-रेखा-उलझनों में,
कठिन सीमा-बन्धनों में,
जग बँधा निष्ठुर क्षणों में;
अश्रुमय कोमल कहाँ तू
आ गई परदेशिनी री!
