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तीन पाती तथा संदेश / सूरदास

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CHANDER



स्याम कर पत्री लिखी बनाइ ।
नंद बाबा सौं बिनै, कर जोरि जसुदा माइ ॥
गोप ग्वाल सखान कौं हिलि-मिलन कंठ लगाइ ।
और ब्रज-नर-नारि जे हैं, तिनहिं प्रीति जनाइ ॥
गोपिकनि लिखि जोग पठयो, भाव जानि न जाइ ।
सूर प्रभु मन और यह कहि, प्रेम लेत दिढ़ाइ ॥15॥

ऊधौ जात ब्रजहिं सुने ।
देवकी बसुदेव सुनि कै, हृदे हेत गुने ॥
आप सौं पाती लिखी, कहि धन्य जसुमति नंद ।
सुत हमारे पालि पठए, अति दियौ आनंद ॥
आइकै मिलि जात कबहुँ न , स्याम अरु बलराम ।
इहौ कहत पठाइहौं अब, तबहिं तन बिस्राम ॥
बाल-सुख सब तुमहिं लूट्यौ, मोहिं मिले कुमार ।
सूर यह उपकार तुम तैं, कहत बारंबार ॥16॥

हम पर काहैं झुकतिं ब्रजनारी ।
साझे भाग नहीं काहू कौ, हरि की कृपा निनारी ॥
कुबिजा लिख्यौ सँदेस सबनि कौ, अरु कीन्हीं मनुहारी ।
हौं तौ दासी कंसराइ की, देखौ मनहिं बिचारी ॥
फलनि माँझ ज्यौं करुइ तोमरी, रहत घुरे पर डारी ।
अब तौ हाथ परी जंत्री के,, बाजत राग दुलारी ॥
तनुतैं टेढ़ी सब कोउ जानत, परसि भई अधिकारी ॥
सूरदास स्वामी करुनामय, अपने हाथ सँवारी ॥17॥

सुनियत ऊधौ लए सँदेसौ, तुम गोकुल कौं जात ।
पाछैं करि गोपिनि सौं कहियौ, एक हमारी बात ॥
मातु पिता को नेह समुझि कै, स्याम मधुपुरी आए ।
नाहिं न कान्ह तुम्हारे प्रीतम, ना जसुदा के जाए ॥
देखौ बूझि आपने जिय मैं, तुम धौं कौन सुख दीन्हे ।
ये बालक तुम मत्त ग्वालिनी, सबे मूड़ करि लीन्हे ॥
तनक दही माखन के कारन, जसुदा त्रास दिखावै ।
तुम हँसि सब बाँधन कौं दौरीं, काहू दया न आवै ॥
जो बृषभान-सुता उत कीन्ही, सो सब तुम जिय जानौ ॥
ताहीं जाल तज्यौ ब्रज मोहन, अब काहैं दुख मानौ ॥
सूरदास प्रभु सुनि-सुनि बातैं, रहे भूमि सिर नाए ।
इत कुबिजा उत प्रेम गोपिकनि, कहत न कछु बनि आए ॥18॥

तब ऊधौ हरि निकट बुलायौ ।
लिखि पाती दोउ हाथ दई तिहिं, औ मुख बचन सुनायौ ॥
ब्रजवासी जावत नारी नर, जल थल द्रुम बन पात ।
जो जिहिं बिधि तासौं तैसैंही, मिलि कहियौ कुसलात ॥ जो सुख स्याम तुमहिं तैं पावत, सो त्रिभुवन कहुँ नाहिं ।
सूरज प्रभु दई सौंह आपुनी, समुझत हौ मन माहिं ॥19॥

पहिलैं प्रनाम नँदराइ सौं ।
ता पाछैं मेरौ पालागन, कहियौ जसुमति माइ सौं ॥
बार एक तुम बरसाने लौं, जाइ सबै सुधि लीजौ ।
कहि बृषभानु महर सौं मेरौ, समाचार सब दीजौ ॥
श्रीदामाऽदि सकल ग्वालनि कौं, मेरौ कोतौ भेंटयौ ।
सुख संदेस सुनाइ सबनि कौं, दिन दिन कौ दुख मेट्यौ ॥
मित्र एक मन बसत हमारैं, ताहि मिलै सुख पाइहौ ।
करि समाधान नीकी बिधि, मोकौ माथौ नाइहौ ॥
डरपहु जनि तुम सघन कुंज मै, हैं तहँ के तरु भारी ॥
बृंदाबन मति रहति निरंतर, कबहुँ न होति निनारी ॥
ऊधौ सौं समुझाइ प्रगट करि, अपने मन की बीती ।
सूरदास स्वामी सौ छल सौं, कही सकल ब्रज-प्रीती ॥20॥

ऊधौ इतनौ कहियौ जाइ ।
हम आवैंगे दोऊ भैया, मैया जनि अकुलाइ ॥
याकौ बिलग बहुत हम मान्यौ, जो कहि पठयौ धाइ ।
वह गुन हमकौं कहा बिसरिहै, बड़े किए पय प्याइ ॥
अरु जब मिल्यौ नंद बाबा सौं, तब कहियौ समुझाइ ।
तौ लौ दुखी होन नहिं पावैं, धौरी धूमरि गाइ ॥
जद्यपि इहाँ अनेक भाँति सुख, तदपि रह्यौ नहिं जाइ ।
सूरदास देखौं ब्रजबासिनि, तबहीं हियौ सिराइ ॥21॥

नीकैं रहियौ जसुमति मैया ।
आवैंगे दिन चारि पाँच मैं, हम हलधर दोउ भैया ॥
नोई, बेंत,बिषान, बाँसुरी द्वार अबेर सबेरैं ।
लै जनि जाइ चुराइ राधिका, कछुक खिलौना मेरैं ॥
जा दिन तैं हम तुमतै बिछुरै, कोउ न कहत कन्हैया ।
उठि न सबेरे कियौ कलेऊ, साँझ न चीषी धैया ॥
कहिये कहा नंद बाबा सौं, जितौ निठुर मन कीन्हौ ।
सूरदास पहूँचाइ मधुपुरी, फेरि न सोधौ लौन्हौ ॥22॥

गहरु जनि लावहु गोकुल जाइ ।
तुमहिं बिना ब्याकुल हम ह्वै हैं, जदुपति करी चतुराइ ॥
अपनौ ही रथ तुरत मँगायौ, दियौ पुरत पलनाइ ।
अपने अंग अभूषन करि-करि, आपुन ही पहिराइ ॥
अपणौ सुकुट पितंबर अपनौ, देत सबै सुख पाइ ।
सूर स्याम तदरूप उपंगसुत, भृगुपद एक बचाइ ॥23॥

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