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लेखक: भवानीप्रसाद मिश्र

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तुमने जो दिया है वह सब
हवा है प्रकाश है पानी है
छन्द है गन्ध है वाणी है
उसी के बल पर लहराता हूँ
ठहरता हूँ बहता हूँ झूमता हूँ
चूमता हूँ जग जग के काँटे
आया है जो कुछ मेरे बाँटे
देखता हूँ वह तो सब कुछ है
सुख दु:ख लहरें हैं उसकी
मैं जो कहता हूँ
समय किसी स्टेनो की तरह
उसे शीघ्र लिपि में लिखता हूँ
और फिर आकर
दिखा जाता है मुझे
दस्तखत कर देता हूँ
कभी जैसा का तैसा उसे
विस्मृति के दराज में धर देता हूँ।
तुमने मुझे जो कुछ दिया है वह सब
हवा है प्रकाश है पानी है।