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तुम्हारा चित्र / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया

कुछ नीले कुछ श्वेत गगन पर

हरे-हरे घन श्यामल वन पर

द्रुत असीम उद्दण्ड पवन पर

चुम्बन आज पवित्र बन गया,

मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।


तुम आए, बोले, तुम खेले

दिवस-रात्रि बांहों पर झेले

साँसों में तूफान सकेले

जो ऊगा वह मित्र बन गया,

मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।


ये टिमटिम-पंथी ये तारे

पहरन मोती जड़े तुम्हारे

विस्तृत! तुम जीते हम हारे!

चाँद साथ सौमित्र बन गया।

मधुर! तुम्हारा चित्र बन गया।

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