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दहर में नक़्शे-वफ़ा / गा़लिब

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 रचनाकार: ग़ालिब                 

दहर में नक़्श-ए वफ़ा वजह-ए तसल्ली न हुआ
है यह वह लफ़्ज़ कि शर्मिन्दह-ए मनी न हुआ

सब्ज़ह-ए ख़त से तिरा काकुल-ए सर-कश न दबा
यह ज़ुमुर्रुद भी हरीफ़-ए दम-ए अफ़`ई न हुआ

मैं ने चाहा था कि अन्दोह-ए वफ़ा से छूटूं
वह सितमगर मिरे मरने पह भी राज़ी न हुआ

दिल गुज़र-गाह-ए ख़याल-ए मै-ओ-साग़र ही सही
गर नफ़स जादह-ए सर-मन्‌ज़िल-ए तक़्वी न हुआ

हूं तिरे व`दह न करने में भी राज़ी कि कभी
गोश मिन्नत-कश-ए गुलबांग-ए तसल्ली न हुआ

किस से महरूमी-ए क़िस्मत की शिकायत कीजे
हम ने चाहा था कि मर जाएं सो वह भी न हुआ

मर गया सदमह-ए यक-जुन्बिश-ए लब से ग़ालिब
नातुवानी से हरीफ़-ए दम-ए `ईसा न हुआ

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