दुनिया ने हम पे जब कोई इल्ज़ाम रख दिया / क़तील
From Hindi Literature
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रचनाकार: क़तील शिफ़ाई | |
दुनिया ने हम पे जब कोई इल्ज़ाम रख दिया
हमने मुक़ाबिल उसके तेरा नाम रख दिया
इक ख़ास हद पे आ गई जब तेरी बेरुख़ी
नाम उसका हमने गर्दिश-ए-अय्याम रख दिया
मैं लड़खड़ा रहा हूँ तुझे देख-देख कर
तूने तो मेरे सामने इक जाम रख दिया
कितना सितमज़रीफ़ है वो साहिब-ए-जमाल
उसने दिया जला के लब-ए-बाम रख दिया
इन्सान और देखे बग़ैर उस को मान ले
इक ख़ौफ़ का बशर ने ख़ुदा नाम रख दिया
अब जिसके जी में आये वही पाये रौशनी
हम ने तो दिल जला के सर-ए-आम रख दिया
क्या मसलहतशनास था वो आदमी "क़तील"
मजबूरियों का जिसने वफ़ा नाम रख दिया
