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दुनिया में कौन कौन न ऐक बार हो गया / ख़्वाजा मीर दर्द

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CHANDER

दुनिया में कौन कौन न ऐक बार हो गया|
पर मुँह फिर इस तरफ़ न किया उसने जो गया|

फिरती है मेरी खाक सबा दर-ब-दर लिए,
अए चश्म-ए-अश्कबार ये क्या तुझ को हो गया|

आगाह इस जहाँ में नहीं ग़ैर बे ख़ुदा,
जागा वही इधर से मूंद आँख सो गया|

तूफ़ान-ए-नोआ ने तो डुबाई ज़मीन फ़क़त,
मैं नन्ग-ए-खल्क़ सारी ख़ुदाई डुबो गया|

बरहम कहीं न हो गुल-ओ-बुलबुल की आशती,
डरता हूं आज बाग़ में वो तुन्द खू गया|

वाइज़ किसे डरावे है योम- उल्हिसाब से,
गिरयां मेरा तो नामा-ए-आमल धो गया|

फूलेंगे इस ज़बां में भी गुल्ज़र-ए-मारफ़त,
यां मैं ज़मीन-ए-शेर में ये तुख्म बो गया|

आया न ऐतदाल पर हरिगज़ मज़ाज-ए-दहर,
मैं गर्चे गर्म- ओ- सर्द-ए-ज़माना समो गया|

अए ‘दर्द’ जिस की आंख खुली इस जहाँ में,
शबनम की तरह जान को अपनी वो रो गया|

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