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दूबों के दरबार में / माखनलाल चतुर्वेदी

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कवि: माखनलाल चतुर्वेदी

~*~*~*~*~*~*~*~

क्या आकाश उतर आया है

दूबों के दरबार में?


नीली भूमि हरी हो आई

इस किरणों के ज्वार में !

क्या देखें तरुओं को उनके

फूल लाल अंगारे हैं;


बन के विजन भिखारी ने

वसुधा में हाथ पसारे हैं।

नक्शा उतर गया है, बेलों

की अलमस्त जवानी का

युद्ध ठना, मोती की लड़ियों से

दूबों के पानी का!


तुम न नृत्य कर उठो मयूरी,

दूबों की हरियाली पर;

हंस तरस खाएँ उस मुक्ता

बोने वाले माली पर!

ऊँचाई यों फिसल पड़ी है

नीचाई के प्यार में!

क्या आकाश उतर आया है

दूबों के दरबार में?


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