नई घटनायें/001
From Hindi Literature
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कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे! दो वर्ष की उपलब्धियाँ | रचनाकारों की टिप्पणियाँ | अपनी टिप्पणी दीजिये
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[edit] मेरी कलम बिके तो मेरा सिर कलम कर देना
बदायूं। चाहें घुटना पड़े कबीरा की तरह, चाहें विष पीना पड़े मीरा की तरह। दास हो न पलना पसंद करुगा, मैं हाथी से कुचलना पसंद करुगा॥
यह वह चंद पंक्तियां हैं, जिनसे डा. बृजेंद्र अवस्थी के स्वभाव का सहज अंदाज लगाया जा सकता है। संघर्ष स्वाभिमान और सफलता यह शब्द राष्ट्रकवि डा.अवस्थी के जीवन के मूलमंत्र रहे। वैसे तो उनके व्यक्तित्व को एक कलम और चंद पन्नों के दायरे में समेटना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, लेकिन इतना अवश्य हैकि अपनी सोच के समुद्र में लेखनी को आकण्ठ डुबोने वाले डा.अवस्थी की प्रत्येक अभिव्यक्ति स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता की भावना को प्रकट करती है। संसार में कुछ विरले ही होते हैं जिनका व्यक्तित्व कुछ शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। कुछ ऐसे ही थे कविवर डा.बृजेंद्र अवस्थी, जिनके हृदय में वात्सल्य का सागर था तो देश की वर्तमान परिस्थितियों के प्रति बाहरी वेदना भी। वाग्देवी मां सरस्वती के प्रसाद से उन्होंने अनेक उत्कृष्ट रचनाएं कर हिन्दी काव्य जगत को समृद्ध बनाया। डा.अवस्थी ने अपने जीवन में न केवल प्रचुर साहित्य का सृजन किया, बल्कि 1960 के बाद अपनी पहचान बनाने वाले कवियों को बनाने संवारने में पितृवत वत्सलता दी। स्वभाव की बात करें तो डा.अवस्थी बड़े ही विनम्र थे। छोटों से अगाध प्रेम, हमउम्र के लोगों से मैत्रीपूर्ण व्यवहार और बड़ों का आदर उनकी खूबी थी। स्वाभिमान की भावना तो उनमें कूट-कूट कर भरी थी। जीवन भर उन्होंने न तो किसी से कुछ मांगा और न ही किसी के समान गिड़गिड़ाए। सिंह सी गर्जना उनकी कविताओं में ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व में भी थी। उनकी कविता का हर शब्द बोलता था। उनके जीवन की सच्चाई और ईमानदारी इन पंक्तियों से साफ परिलक्षित होती है- मां मुझे शक्ति दो कवि धर्म को निभाऊं मैं, दर्द में डूबी हुई तेरी व्यथा को गाऊं मैं, लोभ से भय से जो सच्चाई को दबाऊं मैं, युग का चारण हो, कसीदों से उतर आऊं मैं, तो मेरी वाणी का वहीं इत्तेलम करा देना, मेरी कलम बिके तो मेरा सिर कलम कर देना॥ सरस्वती मां से प्रार्थना करते हुए डा.अवस्थी लगभग हर मंच से अपनी यह पंक्तियां जरूर पढ़ते थे। साहित्यकार डा.रघुवीर शरण शर्मा उनके प्राचार्य पद के दिनों को याद करते हुए लिखते हैं कि उन्होंने कभी भी कुर्सी के बुरे रसों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया और सदा स्नेह लुटाते रहे। वीर रस का कवि होने के बावजूद उनके हृदय में सदा दया, ममता और स्नेह की लहरें हिलोरें लेती रहती थीं।
[edit] बुद्धिजीवियों की ही नहीं मन की भाषा है हिंदी: चक्रधर
नई दिल्ली। प्रसिद्ध कवि डा. अशोक च्रकधर ने कहा कि हिंदी बुद्धिजीवियों की ही नहीं, मन की भाषा है। जिसका दबदबा विश्वस्तर पर होना चाहिए। इसके लिए हम सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। यह बात उन्होंने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में भारतीय सांस्कृतिक संबंद्ध परिषद, साहित्य अकादमी और अक्षरम द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के दौरान कहीं। कार्यक्रम में डा. सत्येंद्र श्रीवास्तव ने कहा कि इंग्लैंड का समाज भी हिंदी भाषा के प्रति बदला है। जिसमें भारतीय समाज व बालीवुड का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गिरिराज किशोर ने कहा कि भारत में जैसे जनता उपेक्षित है, वैसे ही हिंदी। अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि हिंदी को कंप्यूटर के साथ सघनता से जोड़ने की जरूरत है साथ ही राजनीति का अखाड़ा बनती अकादमियों में सुधार होना चाहिए। विश्व पटल पर हिंदी सत्र में डा. लक्ष्मीमल सिंघवी ने कहा कि हिंदी को अहम स्थान तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार को गंभीर प्रयास करने होंगे। सांसद प्रभा ठाकुर ने कहा कि हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने के लिए ऐसे आयोजन की आवश्यकता है। समारोह में पूर्व विदेश सचिव शशांक ने विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से हिंदी की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति को रेखांकित किया। इस अवसर पर जापान में हिंदी के प्रवक्ता डा. सुरेश ऋतुपर्ण ने भी विचार व्यक्त किया।
[edit] रामदरस मिश्र को अक्षरम शिखर सम्मान
नई दिल्ली। हिंदी में साहित्य रचना और इस भाषा के विकास में भूमिका निभाने वाले सात साहित्य सेवियों को यहां हिंदी उत्सव के दौरान सम्मानित किया जाएगा। इनमें प्रख्यात साहित्यकार रामदरस मिश्र भी शामिल हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद साहित्य अकादमी और अक्षरम द्वारा 12, 13 व 14 जनवरी को यहां आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के अंतिम दिन अंतरराष्ट्रीय संस्था अक्षरम की ओर से ये सम्मान दिए जाएंगे। यहां जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र को अक्षरम शिखर सम्मान, अमेरिका के हिंदी साहित्यकार उमेश अग्निहोत्री को अक्षरम प्रवासी हिंदी साहित्य सम्मान, डॉ. सीतेश आलोक को अक्षरम साहित्य सम्मान, कनाडा के श्याम त्रिपाठी को अक्षरम प्रवासी हिंदी सेवा सम्मान, डा. ब्रज बिहारी कुमार को अक्षरम हिंदी सेवा सम्मान तथा ब्रिटेन के फिल्मकार डॉ. निखिल कौशिक को प्रवासी फिल्मकार सम्मान दिया जाएगा। इसी के साथ डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी सम्मान रूस के मदनलाल 'मधु' को दिया जाएगा। समारोह के मुख्य अतिथि विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा होंगे।
[edit] नार्वे में दूसरा विश्व हिन्दी दिवस मनाया गया
१० जनवरी को वाइतवेत युवा केन्द्र, ओस्लो में भारतीय-नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम की ओर से दूसरा विश्व हिन्दी दिवस धूमधाम से मनाया गया। इस ऐतिहासिक हिन्दी दिवस के मुख्य अतिथि थे नार्वे और आइसलैण्ड में भारतीय राजदूत महेश सचदेव, विशेष अतिथि थे ओस्लो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर क्नुत शेलस्तादली और अध्यक्षता कर रहे थे ओस्लो पार्लियामेन्ट के सदस्य और नार्वे से प्रकाशित स्पाइल-दर्पण पत्रिका के सम्पादक सुरेशचन्द्र शुक्ल च्च्शरद आलोकच्च्।
हिन्दी को विदेशों में मान्यता दिलाने के लिए हमारे प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने पिछले वर्ष १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। कार्यक्रम में महेश सचदेव जी ने प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह का सन्देश पढ़ा और उन्होंने बताया कि ओस्लो विश्वविद्यालय में आज से हिन्दी की कक्षायें शुरू की गयी हैं जिसमें जर्मन मूल के प्रोफेसर क्लाउस पेतेर जोलर हिन्दी पढ़ा रहे हैं। जोलर कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके पर उन्होंने अपनी शुभकामनायें भेजीं।
सचदेव जी ने नार्वे में सुरेशचन्द्र शुक्ल च्च्शरद आलोकच्च् को हिन्दी पुस्तकें भेंट की और कहा कि भारतीय प्रवासियों को शुक्लजी की तरह अपनी संस्कृति और राष्ट्रभाषा की सेवा करनी चाहिये। उन्होंने हर उपस्थित व्यक्ति को गुलाब का फूल और हिन्दी में नार्वेजीय लोककथाओं की पुस्तिका भेंट की।
प्रोफेसर क्नुत शेलस्तादली ने विश्व हिन्दी दिवस पर बधाई दी और शुक्ल को ध्वज भेंट किया और कहा कि सौ करोड़ आबादी वाले देश भारत का विश्व के इतिहास और संस्कृति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने अपनी मुम्बई यात्रा के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि भारत में सड़कों, बाजारों और अन्य स्थानों पर मेला रहता है। चहल-पहल भरे एक बाजार में विवाह के आमन्त्रण पत्रों की २० दुकानें एक कतार में देखकर लगा कि भारतीय सपने देखते हैं और खुशहाल रहते हैं। उन्होंने आगे कहा कि जब वह ओस्लो एयरपोर्ट से टैक्सी से घर वापस आ रहे थे तो सड़कों के दोनो ओर सन्नाटा था।
अपने अध्यक्षीय भाषण में सुरेशचन्द्र शुक्ल च्च्शरद आलोकच्च् ने कहा कि हिन्दी हमारी अस्मिता की पहचान है। सौ करोड़ भारतवासियों की राष्ट्रभाषा और विदेशों में भारतीय प्रवासियों की सम्पर्क भाषा है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थान दिलाने के लिए आवश्यक है कि विश्व हिन्दी दिवस जैसे कार्यक्रम आयोजित किये जायें और हम विदेशों में राजनीति में भी सक्रिय हिस्सा लें।
फोरम की मन्त्री अलका भरत ने आगन्तुकों का स्वागत किया। विश्व हिन्दी दिवस पर जिन लोगों ने अपने विचार प्रगट किये, कवितायें पढ़ीं उनमे प्रमुख थे : अनुराग सैम, इन्दरजीत पाल, इन्दर खोसला, इंगेर मारिये लिल्लेएंगेन, राज नरूला, वासदेव भरत, कंवलजीत सिंह, माया भारती, सुरेशचन्द्र शुक्ल च्च्शरद आलोकच्च् और ऊला अनुपम।
[edit] अंतर्राष्ट्रीय हिंदी उत्सव का सफल आयोजन
'अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव' एक रिपोर्ट - नरेश शांडिल्य 'विदेशों में हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिए संसाधनों की कमी को आड़े नहीं आने दिया जायेगा।' भारत के विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा की इस उद्धोषणा और संकल्प के साथ त्रिदिवसीय अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव 2007 सम्पन्न हुआ। यह उत्सव 12-13-14 जनवरी 2007 के दौरान नई दिल्ली में आयोजित किया गया। यह उत्सव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य अकादमी और अक्षरम् संस्था का संयुक्त आयोजन था। तीन दिनों तक चलने वाला यह समारोह नई दिल्ली के इंडिया इन्टरनेशनल सैन्टर , हिन्दी भवन, त्रिवेणी सभागार और फिक्की सभागार में आयोजित किया गया। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के महानिदेशक पवन वर्मा, साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ0 गोपीचन्द नारंग और अक्षरम् के मुख्य संरक्षक डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, संरक्षक डॉ0 अशोक चक्रधर, स्वागत समिति की अध्यक्षा सांसद प्रभा ठाकुर के मार्गदर्शन में आयोजित इस महोत्सव में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से गगनांचल के संपादक अजय गुप्ता और साहित्य अकादमी की ओर से उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने सक्रिय भागीदारी करते हुए समुचित समन्वय किया। भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से उपसचिव (हिन्दी) मधु गोस्वामी की भी सक्रिय भूमिका रही। तीन दिन के इस उत्सव का मुख्य संयोजन अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया। उत्सव के समन्वय का दायित्व नरेश शांडिल्य ने संभाला। उद्धाटन समारोह-12 जनवरी की सुबह नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सैन्टर में त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय उत्सव का उद्धाटन समारोह आयोजित किया गया। उद्धाटन समारोह की अध्यक्षता हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार कमलेश्वर ने की। उन्होंने देश में हिन्दी की स्थिति पर चिन्ता जताते हुए कहा कि हमारे यहां जितना स्वागत लेखकों का होता है उतना किताबों का नहीं । उन्होंने आगे कहा कि भाषा मात्र व्याकरण से नहीं चलती वरन् उसके पीछे पूरी संस्कृति होती है। प्रसिध्द पत्रकार डॉ 0 वेदप्रताप वैदिक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि भारत को महाशक्ति बनने के लिए हिंदी की नितान्त आवष्यकता है । प्रसिध्द लेखक गिरिराज किशोर ने अपने बीज व्यक्तव्य में हिंदी के विकास और प्रचार-प्रसार में दुविधा के कारणों और उसके निदान के उपाय बताए। कार्यक्रम में इंग्लैण्ड से पधारे डॉ 0 सत्येन्द्र श्रीवास्तव उपस्थित थे, अन्य वक्ताओं में सांसद डॉ0 प्रभा ठाकुर ने कहा कि हिंदी करोड़ों लोगों को जोड़ने वाली भाषा बने और जीवन के सभी क्षेत्रों में इसका प्रचार-प्रसार हो। डॉ 0 अशोक चक्रधर ने हिंदी को अध्यापकीय दुनिया से बाहर की चीज बताया। अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि हिंदी को कम्पयूटर के साथ सघनता से जोड़ने की जरुरत है, साथ ही कहा कि राजनीति का अखाड़ा बनती अकादमियों में सुधार होना चाहिए। कार्यक्रम में डायमण्ड पॉकेट बुक्स के नरेन्द्र वर्मा स्वागताध्यक्ष के रुप में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी ने किया। इस सत्र का संयोजन डॉ 0 प्रेम जनमेजय ने किया। विश्व पटल पर हिन्दी 12 जनवरी के पहले अकादमिक सत्र में 'विश्व पटल पर हिंदी' विषय पर गंभीर चिन्तन हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ने की। उन्होंने इस अवसर पर कहा कि हिंदी का सूरज अस्त न हो इसके लिए प्रवासी और निवासी भारतवंशियों को एक मंच पर आना होगा और मजबूत होना होगा। उन्होंने सरकारी बजट बढ़ाने, प्रत्येक दूतावासों में हिंदी अधिकारी की अनिवार्यता , त्रिभाषा फार्मूले के सुचारु क्रियान्वयन, सस्ता साहित्य निर्माण, सभी भारतीय भाषाओं के साझा मंच और देश-विदेश के पाठयक्रम व सूची निर्माण में एकरुपता की बात कही । इस अवसर पर त्रिनिडाड व टोबेगो में भारत के पूर्व उच्चायुक्त रहे वीरेन्द्र गुप्त ने कहा कि हिंदी भाषा का विदेशों में प्रचार-प्रसार हिंदी फिल्मों ने किया। उन्होंने इस संबंध में अपने समय के फिल्मी गीतों 'मेरा जूता है जापानी.....' और 'ईचक दाना-बीचक दाना.....' का विशेष रुप से जिक्र किया। जापान में हिंदी के प्रो 0 सुरेश ऋतुपर्ण ने कहा कि विदेशों में हिन्दी शिक्षण की समुचित व्यवस्था की महती आवश्यकता है। उन्होंने विश्व फलक पर हिंदी की स्थिति को संतोषजनक बताया। भारत के पूर्व विदेश सचिव शशांक कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे उन्होंने अमेरिकी शिक्षण संस्थानों , सामाजिक क्षेत्रों में भारतीय सांस्कृतिक योगदान की आवश्यकता महसूस करने की बात कही। कार्यक्रम का कुशल संचालन विदेश मंत्रालय की उपसचिव (हिंदी) मधु गोस्वामी ने किया। इस सत्र का संयोजन हिन्दी सेवी नारायण कुमार ने किया। वैश्वीकरण और हिन्दी मीडिया 12 जनवरी के दूसरे अकादमिक सत्र में 'वैश्वीकरण और हिन्दी मीडिया' पर विमर्श हुआ। सत्र की अध्यक्षता आउटलुक (हिन्दी) के संपादक व चर्चित पत्रकार आलोक मेहता ने की। उनका कहना था कि हिन्दी मीडिया को आत्मालोचन की जरुरत है। उन्होंने पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति पर जोर दिया। इसी सत्र में डॉ 0 अशोक चक्रधर ने हिन्दी मीडिया में 'स' के जिन सात पुटों के प्रयोग का आह्वान किया, वे हैं - सम्पर्क, संवाद, सम्प्रेषण, संबंध, संवेदना, समानता और सम्मान। इसी सत्र में वॉयस ऑफ अमेरिका के पत्रकार रहे उमेश अग्निहोत्री ने विश्व में हिंदी मीडिया की स्थिति पर अपना आलेख पढ़ा। प्रसिध्द पत्रकार मनोज रघुवंशी ने हिंदी को मीडिया की सशक्त भाषा कहा । पंकज दूबे ने हिंदी की लोकप्रियता पर अपने विचार प्रकट किए। कार्यक्रम का संचालन चैतन्य प्रकाश ने किया। पत्रकार चंडीदत्त शुक्ल इस सत्र के संयोजक थे। अनीता वर्मा और संगीता राय ने सह-संयोजक की भूमिका संभाली। कॉरपोरेट जगत और हिन्दी 12 जनवरी का तीसरा अकादमिक सत्र था - 'कॉरपोरेट जगत और हिन्दी' जिसकी अध्यक्षता हीरो सोवा कम्पनी के अध्यक्ष योगेश मुंजाल ने की। इस विषय पर बोलते हुए सत्र के मुख्य अतिथि और मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी ने कहा कि हिंदी एक बड़ी जनसंख्या की भाषा है , इसका अपना बाजार है। इसीलिए हिंदी कॉरपोरेट जगत की जरुरत है। योगेश मुंजाल ने हिंदी के लिए प्रतिबध्दता पर जोर दिया। इकोनोमिक टाइम्स (ऑन लाईन) के संपादक के.ए.बद्रीनाथ ने हिंदी सीखने और जानने की आवश्यकता पर बल दिया। उक्त विषय से जुड़े विशेषज्ञों - गोपाल अग्रवाल , कैलाश गोदुका व डॉ0 जवाहर कर्नावट ने भी अपने-अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन ऋतु गोयल ने किया और सहयोगी भूमिका डॉ0 रामप्रकाश द्विवेदी और अनिल पाण्डेय ने निभाई। प्रेमचन्द के प्रसिध्द उपन्यास - 'रंगभूमि' पर आधारित नाटक की प्रस्तुति 12 जनवरी के सायंकालीन सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अन्तर्गत नई दिल्ली स्थित हिंदी भवन सभागार में विश्व के जाने-माने हिंदी उपन्यासकार प्रेमचन्द के प्रसिध्द उपन्यास 'रंगभूमि ' पर आधारित एक नाटक की भव्य-प्रस्तुति की गई। सुरेन्द्र शर्मा के असाधारण निर्देशन और सूरदास की भूमिका में एन. के. पन्त के अभिनय की बदौलत यह नाटक अविस्मरणीय बन चुका है। हांलांकि इस नाटक की प्रस्तुति दिल्ली में कुछ दिनों पूर्व भी हो चुकी थी , फिर भी इस नाटक को देखने अपार संख्या में दर्शक पधारे। नाटक के दृश्यों को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यह सरासर झूठ है कि दर्शक नाटक से दूर होता जा रहा है , बल्कि नाटक में दम हो तो दर्शक खुद-ब-खुद खिंचा चला आएगा। नाटय-समीक्षकों को ऐसी प्रस्तुतियों पर ध्यान देना चाहिए। वे पता नहीं किन नाटकों की चर्चा में खोए रहते हैं। इस सत्र की अध्यक्षता करने पूर्व सांसद डॉ 0 महेशचन्द शर्मा पधारे। मुख्य अतिथि के रुप में एम.एस.सी. ग्रुप के चेयरमैन सुभाष अग्रवाल उपस्थित थे। नाटक से पहले आयोजित इस संक्षिप्त कार्यक्रम का संचालन कवि-गजलकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने किया। इस कार्यक्रम के संयोजक रामबीर शर्मा थे। हिन्दी अध्ययन और अनुसंधान : स्थिति और सम्भावनाएं 13 जनवरी को सभी अकादमिक सत्र नई दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में आयोजित किए गए। इस दिन के प्रात:कालीन सत्र में 'हिंदी अध्ययन और अनुसंधान : स्थिति और सम्भावनाएं' विषय पर विचार-विमर्श किया गया। इस सत्र की अध्यक्षता केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डॉ0 शंभूनाथ ने की। इस अवसर पर उन्होंने हिंदी के क्षेत्र में शोध की स्थिति पर टिप्पणी करते हुंए कहा कि हिंदी में शोध की स्थिति सूखी घास के ढेर की तरह है। इस स्थिति में सुधार की नितांत आवश्यकता है। केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो की निदेषक कुसुमवीर ने सरकारी कर्मचारियों के लिए देश भर में चलाए जा रहे हिंदी शिक्षण और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी दी। इसी सत्र में बोलते हुए इटली के मार्क जौली ने कहा कि अगर भारत में हिंदी खत्म हुई तो भारत सारे जहां से अच्छा नहीं रहेगा। पौलैण्ड की प्रो 0 मोनिका ब्रोवारचिक ने यूरोपीय देशों में बढते हिंदी रुझान की बात की। यू.एस.ए. से पधारी प्रो0 सुषम बेदी ने ज्ञान को जीवन पटल के सभी स्तरों पर उतारने की बात की। केन्द्रीय हिंदी संस्थान , आगरा की प्रो0 वशिनी शर्मा और दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ0 विमलेश कान्ति वर्मा ने उक्त विषय पर अपने विचार रखते हुए हिंदी की अध्ययन पध्दतियों और अनुसंधान की दशा-दिशा का विशद विश्लेषण किया तथा हिंदी की वर्तमान अवस्था के मूल्यांकन की बात की। दिल्ली विश्वविद्यालय के चैतन्य प्रकाश ने भाषा कक्षा के संदर्भ में नई संकल्पनाओं की जरुरत पर बल दिया। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय मुक्त विद्यालय , गुवाहाटी के संयुक्त निदेशक डॉ0 राजेश कुमार ने और संयोजन श्री अरविन्द महाविद्यालय (सायं) की रीडर डॉ0 ऋतु जैन ने किया। विविध क्षेत्रों में हिंदी 13 जनवरी को सम्पन्न हुए दूसरे सत्र में 'विविध क्षेत्रों में हिंदी' विषय पर विचार हुआ। सत्र की अध्यक्षता कर रहे विज्ञान एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष डॉ 0 विजय कुमार ने हिंदी में कार्य कर रही संस्थाओं के समन्वय पर बल दिया और हिंदी की अदम्य शक्ति की विशेषता बताते हुए इसे अधिक से अधिक प्रयोजनमूलक बनाने की बात कही। इस सत्र के मुख्य अतिथि पूर्व सांसद एवं हिंदी के प्रख्यात विद्वान डॉ 0 रत्नाकर पांडेय ने कहा कि हिन्दी को मात्र अनुवाद की नहीं बल्कि मौलिक भाषा बनने की जरुरत है। सत्र में 'हिंदी में रोजगार' विषय पर दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ रीडर डॉ 0 पूरनचन्द टंडन, 'उत्तर पूर्व में हिंदी' विषय पर डॉ0 बृज बिहारी कुमार, 'जनसंपर्क में हिन्दी ' विषय पर अजीत पाठक, 'विज्ञान में हिंदी' विषय पर सेवानिवृत्त एयर वाईस मार्शल विश्वमोहन तिवारी ने भाषायी अस्मिता और जातीय अस्मिता के अन्योन्याश्रय संबंध की चर्चा की। हिंदी के अन्यान्य क्षेत्रों पर डॉ 0 परमानन्द पांचाल ने हिंदी माध्यम को हिंदी की सबसे बड़ी जरुरत बताया वहीं प्रो0 भूदेव षर्मा ने हिंदी के विश्वव्यापी स्वरुप की चर्चा की । डॉ0 कुसुम अग्रवाल ने हिंदी की विकास यात्रा में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की। मॉरीशस की अलका धनपत ने 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' इस तर्ज पर हिंदी के विकसित होने की बात कही। सत्र का संचालन हिन्दी सेवी नारायण कुमार ने और संयोजन केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के उपनिदेशक विनोद संदलेश ने किया। समकालीन साहित्य का परिदृश्य 13 जनवरी के तीसरे सत्र में 'समकालीन साहित्य का परिदृश्य' विषय पर गहनता से विचार-विमर्श किया गया। भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक व प्रख्यात आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने कहा कि साहित्य का मूल धर्म 'सहित भाव' में है साथ ही उन्होंने बताया कि बाजार और साहित्य की हिंदी की दिशाएं अलग-अलग हो गई हैं। हिंदी भाषा को लगातार अपदस्थ किया जा रहा है। साहित्यक परिदृश्य की तीन महत्वपूर्ण कड़ियां - लेखक , प्रकाशक और पाठक हैं, इनके बीच समन्वयात्मक संबंध होने चाहिएं । उन्होंने कहा कि आज के लेखक की सबसे बड़ी चुनौती सूचना या घटना की तीव्रता है । इस अवसर पर साहित्यकार गंगाप्रसाद विमल ने हिंदी को विश्व की किसी भी भाषा से सुदृढ़ और सशक्त बताते हुए राष्ट्रीय और अन्तररराष्ट्रीय परिदृश्य में समकालीन हिंदी लेखन के बहुआयामी व्यक्तित्व की प्रशंसा की। राजी सेठ ने वर्तमान साहित्य के स्वरुपगत ढांचे की चर्चा की। डॉ0 दिविक रमेश ने रचनाकारों की तीन कोटियां जाने, माने और जाने और माने जाने वाले बतायी और इन पर गुटबंदी और पक्षधरता का आरोप लगाया। डॉ 0 रमणिका गुप्ता ने कहा दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य को साहित्य की मुख्यधारा में जगह मिलनी चाहिए। डॉ0 नवीनचंद लोहानी ने भी अपने विचार रखे। सभी वक्ताओं ने विस्तार से साहित्य की विभिन्न विधाओं पर प्रकाश डाला। सत्र का संचालन डॉ0 प्रेम जनमेजय ने किया। संयोजिका मिनी गिल और सह-संयोजक रमेश तिवारी थे। प्रौद्योगिकी और हिन्दी 13 जनवरी के चौथे सत्र के दौरान 'प्रौद्योगिकी और हिन्दी' विषय पर विचार हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता इस विषय के विशेषज्ञ और प्रख्यात कवि डॉ0 अशोक चक्रधर ने की । उन्होंने कहा कम्पयूटर केवल अंकों की भाषा पहचानता है, उसकी नजर में दुनियां की हर भाषा महज अंकों का समुच्चय है। बालेन्दु दाधीच (प्रभा साक्षी) ने हिंदी कोड व यूनीकोड के विषय में बताया। विशाल डाकोलिया (माइक्रोसॉफ्ट) ने हिंदी सॉफ्टवेयर पर अत्यन्त प्रभावषाली वक्तव्य दिया और प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ विजय कुमार मल्होत्रा ने हिंदी को कम्पयूटर से जोड़ने की बात कही। सत्र का संचालन डॉ 0 संजय सिंह बघेल ने किया। सत्र-संयोजन में रघुवीर शर्मा ने महत्पवूर्ण भूमिका निभाई। समकालीन साहित्य प्रस्तुति 13 जनवरी को आयोजित यह पांचवां सत्र था। इस सत्र की अध्यक्षता हिंदी के जाने-माने कथाकार हिमांशु जोशी ने की। साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन साहित्य' के संपादक अरुण प्रकाश ने अपनी कहानी और प्रख्यात व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी ने अपने व्यंग्य लेख का पाठ किया। साहित्य के इस गरिमामय सत्र का संचालन कवयित्री , कथाकार अलका सिन्हा ने किया। इस सत्र का संयोजन डॉ0 हरजेन्द्र चौधरी और प्रगति सक्सेना ने किया। विदेशी प्रतिनिधियों से संवाद 13 जनवरी के इस रात्रिकालीन सत्र में उत्सव में पधारे लगभग सभी प्रवासी प्रतिनिधि उपस्थित थे। यह कार्यक्रम एक पारस्परिक स्नेह मिलन जैसा था। इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की पत्रिका 'गगनांचल' के संपादक अजय गुप्ता ने की। मुख्य अतिथि के रुप में सांसद डॉ0 प्रभा ठाकुर और प्रख्यात हिंदी विद्वान डॉ0 दाउ जी गुप्त उपस्थित थे। भारतीय उच्चायुक्त लंदन के हिंदी और संस्कृति अधिकारी राकेश दूबे इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के नाते पधारे। इस अवसर पर भावना कुंवर के गजलों पर लिखे गए शोध प्रबन्ध और उषा राजे सक्सेना (यू.के.) के मिथलेश तिवारी द्वारा गाई गई गजलों की सी.डी. का लोकार्पण भी हुआ। सत्र के प्रारम्भ में डॉ0 मृदुल कीर्ति ने प्रवासियों के स्वागतार्थ एक कविता प्रस्तुत की। विदेशी प्रतिनिधियों में मदनलाल ' मधु' (रुस) डॉ0 सत्येन्द्र श्रीवास्तव (यू.के.), रेणु राजवंशी गुप्ता (यू.एस.ए.), श्याम त्रिपाठी (कनाडा), अमित जोशी (नॉर्वे), स्वर्ण तलवाड़ (यू.के.), जैन्सी सम्पत (त्रिनिडाड एवं टोबेगो) व जय वर्मा (यू.के.), लुडमिला एवं तात्याना (रुस), दिव्या माथुर (यू.के.) आदि प्रमुख थे। इस सत्र का संचालन यू.के. हिन्दी समिति के अध्यक्ष और 'प्रवासी टुडे' पत्रिका के संपादक डॉ0 पदमेश गुप्त ने किया। समकालीन प्रवासी साहित्य अन्तरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव के तीसरे दिन 14 जनवरी को दो प्रात:कालीन अकादमिक सत्रों का आयोजन इंडिया इंटरनेशनल सैन्टर , नई दिल्ली में हुआ। पहले सत्र में 'समकालीन प्रवासी साहित्य' विषय पर विमर्श हुआ। इस सत्र की अध्यक्षता हिंदी के प्रख्यात उपन्यासकार डॉ0 नरेन्द्र कोहली ने की। वरिष्ठ कवि मदनलाल 'मधु' ने कहा कि सोवियत संघ के विघटन के कारण अब वहां हिंदी प्रचार-प्रसार पर प्रतिकूल असर पड़ा है। श्याम त्रिपाठी ने कहा कि विषम परिस्थिति में भी हिंदी के लिए प्रवासी लेखक सक्रिय हैं। अपने अध्यक्षीय व्यक्तव्य में डॉ 0 नरेन्द्र कोहली ने कहा कि प्रवासी भारतीय साहित्य वह है जिसमें भारतीय मूल्य विद्यमान हों। कवयित्री शैल अग्रवाल ने हिंदी साहित्य को दलित साहित्य, स्त्री साहित्य, प्रवासी साहित्य इत्यादि के सांचों में बांटने को सर्वथा अनुचित बताया। सत्र का संचालन प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ0 हरीश नवल ने किया और संयोजन नरेश शांडिल्य, शशिकांत और केदार कुमार मण्डल ने किया। बदलते परिप्रेक्ष्य में अकादमियों और हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं की भूमिका 14 जनवरी के उपरोक्त विषयक इस दूसरे सत्र की अध्यक्षता उत्तरप्रदेश हिंदी भाषा संस्थान के उपाध्यक्ष और कविता मंचों के प्रख्यात कवि सोम ठाकुर ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि देश की चारों दिशाओं उत्तर , दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में हिंदी पीठों की स्थापना होनी चाहिए। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक राधेश्याम शर्मा ने कहा कि अकादमियां तभी सफल हो सकती हैं जब राज्य की एक सुस्पष्ट भाषा नीति हो। इस विमर्श में हिंदी यू.एस.ए. संस्था के संयोजक देवेन्द्र सिंह ने अमेरिका में हिन्दी संस्थाओं की भूमिका की चर्चा की। यू.के. हिंदी समिति के अध्यक्ष डॉ 0 पदमेश गुप्त ने हिंदी के लिए ग्लोबल नेटवर्किन्ग की आवश्यकता जताई। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मंत्री संचालक कैलाश पन्त ने इस अवसर पर भाषा को राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ने की बात कही। इस सत्र का संचालन डॉ 0 जवाहर कर्नावट ने किया। सत्र के संयोजन में साहित्य अकादमी के देवेश की सराहनीय भूमिका रही। ब्रिटेन में रह रहे प्रवासी फिल्मकार डॉ0 निखिल कौशिक की फिल्म - ' भविष्य - द फ्यूचर' की प्रस्तुति 14 जनवरी को नई दिल्ली के मण्डी हाउस स्थित 'फिक्की सभागार' में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के अन्तर्गत जब ब्रिटेन में रहे रहे प्रवासी भारतीय फिल्मकार डॉ 0 निखिल कौशिक की फिल्म 'भविष्य द फ्यूचर' प्रदर्शित करने की तैयारी चल रही थी तो लगा कि हिंदी के अकादमिक सत्रों की गंभीरता और थकावट से जूझने के बाद कुछ राहत के क्षण हाथ लगे हैं। लगा कि हां , अब वास्तव में उत्सव का रुप सामने आ रहा है। पहले फिल्म दिखाई जाएगी, फिर नृत्य की रंगारंग प्रस्तुति होगी और फिर भाव-विभोर करने के लिए कविता-उत्सव का माहौल होगा। फिक्की सभागार में दर्शक बड़ी मात्रा में उपस्थित थे...एक उत्सवी चहल-पहल हर तरफ व्याप्त थी। डॉ 0 निखिल कौशिक फिल्म के लेखक-निर्माता-निर्देशक तो थे ही, वे एक कुशल अभिनेता के रुप में भी फिल्म में दिखाई दिए। फिल्म प्रतिभा पलायन को रोकने का संदेश लिए थी और रोचकता से भरपूर थी । दिखाया गया कि कैसे एक प्रवासी भारतीय डॉक्टर का पुत्र जब प्रतिभाशाली नेत्र-चिकित्सक बनता है और भारत से लंदन में नेत्र-चिकित्सक लड़की के प्रेमपाश में बंधता है तो वे दोनों शादी करके इंग्लैण्ड नहीं बल्कि भारत में रहकर डॉक्टरी सेवा देने का फैसला करते हैं। फिल्म में प्रसिध्द गजलकार , गीतकार कुंवर बैचेन और माया गोविन्द के गीतों को भी शामिल किया गया है। फिल्म प्रस्तुति के बाद एक संक्षिप्त सा कार्यक्रम हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ0 कुंवर बेचैन ने की। विशिष्ट अतिथि के नाते पधारी जनमत टी.वी. की एक्जिक्यूटिव प्रोडयूसर सुश्री श्वेता रंजन ने इस अवसर पर कहा कि इस फिल्म को देखने के बाद लगता है कि मुझे अपने विदेश जाकर काम करने की योजना पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। कार्यक्रम में डॉ 0 निखिल कौशिक, डॉ0 विक्रम सिंह, इस फिल्म के अभिनेता हरीश भल्ला और अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने भी अपने संक्षिप्त विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन नरेश शांडिल्य ने किया। संयोजन का दायित्व बी. संजय ने संभाला। नृत्य प्रस्तुति नलिनी-कमलिनी फिल्म प्रस्तुति कार्यक्रम के तुरन्त बाद प्रसिध्द नृत्यांगना बहनों - नलिनी और कमलिनी की नृत्य प्रस्तुति हुई। सारा सभागार मंत्र-मुग्ध सा घंटों चली इस शानदार प्रस्तुति का रसास्वादन करता रहा। इस अवसर पर पद्मश्री पं0 सुरिन्दर सिंह (सिंह बंधु) की अध्यक्षता और आर्ट ऑफ लिविंग के डॉ 0 जे. पी. गुप्ता, महाराजा अग्रसेन इंस्ट्टीयूट के नन्द किशोर गर्ग, महाराजा अग्रसेन कॉलेज अग्रोहा के जगदीश मित्तल, आइडियल इंस्ट्टीयूट ऑफ टैक्नोलोजी गाजियाबाद के अतुल जैन के सान्निध्य में एक संक्षिप्त कार्यक्रम हुआ जिसका संचालन अलका सिन्हा ने और संयोजन विनीता गुप्ता ने किया। सम्मान अर्पण समारोह 14 जनवरी को फिक्की सभागार में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव में सम्मान अर्पण समारोह और भव्य कवि सम्मेलन सम्पन्न हुआ। अक्षरम् के मुख्य संरक्षक डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी जब अस्वस्थता के बावजूद व्हील चेयर पर समारोह की अध्यक्षता के लिए सभागार में पधारे तो वातावरण तालियों से गूंज उठा। उनके साहस और उत्साह की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम है। भारत सरकार के विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा की मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थिति कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान कर रही थी। इस अवसर पर बोलते हुए जब उन्होंने यह उद्धोषणा की कि विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए संसाधनों की कमी को आड़े नहीं आने दिया जायेगा, तो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच सभागार में उपस्थित हर हिन्दी प्रेमी के चेहरे पर एक खास चमक के दर्शन हुए। आशा की जानी चाहिए कि उनका यह कथन एक स्थाई रुप लेगा। मंत्री महोदय ने देश-विदेश के साहित्यकारों , हिंदी सेवियों को अक्षरम् सम्मान प्रदान किए। इस वर्ष का सबसे बड़ा 'अक्षरम् शिखर सम्मान' समकालीन हिन्दी साहित्य के शलाका-पुरुष और साहित्य की लगभग हर विधा में निरन्तर स्तरीय लेखन करने वाले वरिष्ठ साहित्यकार डॉ 0 रामदरश मिश्र को दिया गया। अन्य सम्मानित व्यक्तित्वों में उमेश अग्निहोत्री, यू.एस.ए. (अक्षरम् प्रवासी साहित्य सम्मान), डॉ0 सीतेश आलोक , भारत (अक्षरम् साहित्य सम्मान), श्याम त्रिपाठी, कनाडा, (अक्षरम् प्रवासी हिन्दी सम्मान), डॉ0 बृज बिहारी कुमार, भारत (अक्षरम् हिन्दी सेवा सम्मान), डॉ0 निखिल कौशिक, यू.के. (अक्षरम् प्रवासी फिल्मकार सम्मान), पद्म श्री डॉ0 मदनलाल 'मधु' रूस (लक्ष्मीमल्ल सिंघवी सम्मान) जैसे वरिष्ठ साहित्यकार व हिंदी प्रेमी शामिल थे। कार्यक्रम के दौरान डॉ 0 विमलेश कांति वर्मा व डॉ0 अषोक चक्रधर ने सम्मेलन के निष्कर्षों को बिन्दु रुप में प्रस्तुत किया। इस उत्सव के प्रमुख प्रायोजक प्रवेक कल्प हर्बल प्रोडक्ट (प्रा.) लि. के संजय गुप्ता कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रुप में मौजूद थे। अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन 14 जनवरी की रात्रि फिक्की के भव्य सभागार में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव-2007 का आखिरी कार्यक्रम अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलन के रुप में सम्पन्न हुआ। इस गरिमामयी कवि सम्मेलन की अध्यक्षता अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हिंदी के वरिष्ठ कवि डॉ 0 कैलाश वाजपेयी ने की। वरिष्ठ गीतकार व गजलकार बालस्वरुप राही और प्रख्यात कवि डॉ0 अशोक चक्रधर विशिष्ट अतिथि के रुप में उपस्थित रहे। कवि सम्मेलन प्रारम्भ होने से पूर्व ब्रिटेन की प्रसिध्द कवयित्री दिव्या माथुर के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह 'चंदन पानी' का लोकार्पण विदेश राज्यमंत्री जी के हाथों से भी सम्पन्न हुआ। यह संग्रह डायमण्ड बुक्स ने प्रकाशित किया है। कवि सम्मेलन में काव्य पाठ करने वाले कवि-कवयित्रियों में विदेश से डॉ 0 सत्येन्द्र श्रीवास्तव (यू.के.), पद्मश्री मदनलाल 'मधु' (रुस), डॉ0 श्याम त्रिपाठी (कनाडा) , दिव्या माथुर (यू.के.), डॉ0 पदमेश गुप्त (यू.के.), देवेन्द्र सिंह (यू.एस.ए.), रेणु राजवंशी गुप्ता (यू.एस.ए.) , डॉ0 निखिल कौशिक (यू.के.), शैल अग्रवाल (यू.के.), जया वर्मा (यू.के.), अनुज अग्रवाल (यू.के.) और भारत से डॉ0 रामदरश मिश्र (दिल्ली), बालस्वरुप राही (दिल्ली), डॉ0 अशोक चक्रधर (दिल्ली), डॉ0 कुंवर बेचैन (गाजियाबाद), सोम ठाकुर (लखनऊ), बुध्दिसेन शर्मा (इलाहाबाद), मुनव्वर राना (कोलकाता), डॉ 0 सरिता शर्मा (दिल्ली), डॉ0 बलदेव वंशी (दिल्ली), ब्रजेन्द्र त्रिपाठी (दिल्ली), लक्ष्मीशंकर वाजपेयी (दिल्ली) , नरेश शांडिल्य (दिल्ली), अनिल जोशी (दिल्ली), गजेन्द्र सोलंकी (दिल्ली), राजेश चेतन (दिल्ली), शशिकान्त (दिल्ली) , आलोक श्रीवास्तव (दिल्ली), संदेश त्यागी (श्रीगंगानगर) शामिल थे। कवि सम्मेलन मे श्रोताओं ने 'गीत-गजल, दोहा-कविता हर विधा का भरपूर आनंद लिया । देर रात तक चले इस कवि सम्मेलन का कुशल संचालन अनिल जोशी ने किया। बाद में सभी कवियों को कवि सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ 0 कैलाश वाजपेयी ने प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया । तीन दिनों तक चले हिंदी उत्सव के इस अंतिम कार्यक्रम के अन्त में अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने सभी का आभार व्यक्त किया। सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए इस त्रिदिवसीय उत्सव के अकादमिक सत्रों के संयोजन में डॉ0 विमलेश कान्ति वर्मा और डॉ0 प्रेम जनमेजय की महती भूमिका रही। अक्षरम् के गजेन्द्र सोलंकी, राजेश चेतन, डॉ0 जवाहर कर्नावट, डॉ0 राजेश कुमार, चैतन्य प्रकाश, शशिकांत, अलका सिन्हा, ऋतु गोयल आदि ने कार्यक्रम के संयोजन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। सुश्री पायल शर्मा ने तीनों दिन के कार्यक्रमों की वीडियो और फोटोग्राफी कवरेज के लिए अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दीं। प्रवेक कल्प हर्बल प्रोडक्ट (प्रा.) लि. के चेयरमैन अजय गुप्ता इस उत्सव के मुख्य प्रायोजकों में से थे। अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी उत्सव 2007 में व्यक्त मुख्य विचार ' विदेशों में हिंदी प्रचार-प्रसार के लिए संसाधनों की कमी को आड़े नहीं आने दिया जायेगा' विदेश राज्यमंत्री आनंद शर्मा ' हमारे यहां लेखकों का तो स्वागत होता है, उनकी किताबों का नहीं' प्रख्यात साहित्यकार कमलेश्वर ' हिंदी का सूरज अस्त न हो इसके लिए प्रवासी और निवासी भारतवंशियों को एक मंच पर आना होगा' ब्रिटेन में भारत के पूर्व उच्चायुक्त डॉ0 लक्ष्मीमल्ल सिंघवी ' विदेशों में हिन्दी भाषा का प्रचार हिंदी फिल्मों ने किया' त्रिनिदाद व टोबेगो में भारत के पूर्व उच्चायुक्त वीरेन्द्र गुप्त ' हिंदी मीडिया को आत्मालोचन की जरुरत है' हिंदी आउटलुक के संपादक आलोक मेहता ' हिंदी एक बड़ी जनसंख्या की भाषा है, इसलिए हिंदी कॉरपोरेट जगत की जरुरत है' मैनेजमेंट गुरु अरिंदम चौधरी ' हिंदी के लिए प्रतिबध्दता की बहुत जरुरत है' -हीरो सोवा के अध्यक्ष योगेश मुंजाल ' हिंदी सीखना और जानना अब जरुरी हो गया है' -इकोनोमिक टाइम्स के संपादक के.ए.बद्रीनाथ ' अगर भारत से हिंदी खत्म हुई तो वह सारे जहां से अच्छा नहीं रहेगा' इटली के मार्क जौली यूरोप में भारतीय भाषाओं के अध्ययन व अध्यापन की एक लम्बी परंपरा रही है पौलेंड की मोनिका ब्रोवारचिक ' हिंदी विश्व की किसी भी भाषा से कमतर नहीं' पूर्व सांसद रत्नाकर पांडेय ' हिंदी भाषा को लगातार अपदस्थ किया जा रहा है' भारतीय ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक एवं आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ' प्रवासी भारतीय साहित्य वह है जिसमें भारतीय मूल्यों का समावेश प्रख्यात उपन्यासकार डॉ0 नरेन्द्र कोहली हिंदी में शोध की स्थिति सूखी घास के ढेर की तरह है' केन्द्रीय हिंदी संस्थान , आगरा के निदेशक शंभूनाथ ' देश की चारों दिशाओं उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में हिंदी पीठ की स्थापना होनी चाहिए उत्तरप्रदेश हिंदी भाषा संस्थान के उपाध्यक्ष सोम ठाकुर ' भाषाई अकादमियां तभी सफल हो सकती हैं, जब राज्य की एक स्पष्ट भाषा नीति हो' हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक राधेश्याम शर्मा ' हिंदी में ग्लोबल-नेटवर्किन्ग की महती आवश्यकता है यू.के.हिंदी समिति के अध्यक्ष डॉ0 पदमेश गुप्त ' साहित्य को प्रवासी साहित्य, स्त्री साहित्य, दलित साहित्य इत्यादि सांचों में बांटना उचित नहीं है' यू.के. की कवयित्री-कथाकार शैल अग्रवाल ।
[edit] Koreans invade DU Hindi class
SOUTH KOREANS it seems are the foreigners most eager to pick up Hindi — and they want to do it fast. The majority of students enrolled for the short-term Hindi courses at Delhi University are South Koreans. Reason? Great job prospects in India with Korean majors Samsung, LG and Hyundai. M.J. Park, director, Korea Trade Investment Promotion Agency, says that with 200 Korean companies already here and many more showing interest, India has emerged as the land of oppor tunity. “Earlier, Korea’s attention was on China. But now the scope for growth is greater in India,” says Park.Over 3,000 South Koreans are working and studying in India. Of the 28 foreign students enrolled in the certificate, diploma and advanced courses in Hindi, 14 are from South Korea. DU student Park Soon Ki is a graduate in global marketing and advertising from Busan. He and his friend Huo Jong Cheol, a computer scientist from Seoul, are in India studying, travelling, and job-hunting. “Many Koreans working in India speak good English, but the workers in the factory speak Hindi,” says Ruchika Batra, GM (corporate communication) at Samsung. “We had a programme under which executives from Korea would spend a year in India learning the language and knowing the local culture.” Koreans at LG too are busy learning Hindi. “They make a lot of effort to localise themselves,” says Y.V. Verma, director (human resources), LG. SOUTH KOREANS it seems are the for- eigners most eager to pick up Hindi — and they want to do it fast. The majority of students enrolled for the short-term Hindi courses at Delhi University are South Koreans. Reason? Great job prospects in India with Korean majors Samsung, LG and Hyundai. M.J. Park, director, Korea Trade In- vestment Promotion Agency, says that with 200 Korean companies already here and many more showing interest, India has emerged as the land of oppor- tunity. “Earlier, Korea’s attention was on China. But now the scope for growth is greater in India,” says Park. Over 3,000 South Koreans are work- ing and studying in India. Of the 28 for- eign students enrolled in the certificate, diploma and advanced courses in Hindi, 14 are from South Korea. DU student Park Soon Ki is a gradu- ate in global marketing and advertising from Busan. He and his friend Huo Jong Cheol, a computer scientist from Seoul, are in India studying, travelling, and job-hunting. “Many Koreans working in India speak good English, but the workers in the factory speak Hindi,” says Ruchika Batra, GM (corporate communication) at Samsung. “We had a programme un- der which executives from Korea would spend a year in India learning the lan- guage and knowing the local culture.” Koreans at LG too are busy learning Hindi. “They make a lot of effort to lo- calise themselves,” says Y.V. Verma, di- rector (human resources), LG.
[edit] १८वां अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव सम्पन्न
भारत-नार्वे सूचना और सांस्कृतिक फोरम के तत्वाधान में २ सितम्बर २००६ को यूथ सेन्टर, ओसलो में १८वां अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव कविता, संगीत, नृत्य, व्याख्यान और पुरस्कार वितरण सहित धूमधाम के साथ सम्पन्न हुआ।
संस्कृति, साहित्य, सेतु और कला पुरस्कार
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे नार्वे और आइसलैण्ड में भारतीय राजदूत महेश सचदेव, विशेष अतिथि थे सांसद और वित्त मन्त्रालय के सदस्य हाइकी होलमोस और अध्यक्षता की फोरम के अथ्यक्ष सुरेशचन्द्र शुक्ल ने। कार्यक्रम का संचालन किया ऊला अनुपम, मंच सज्जाा और ध्वनि आरिल सोरूम, व्यवस्था संचालन संगीता सीमोनसेन शुक्ला और स्वागत माया भारती, धनीराम और सिगरीद मारिये रेफसुम ने किया। भारत-नार्वे सूचना और सांस्कृतिक फोरम ने इस वर्ष चार पुरस्कार वितरित किये। सेतु सम्मान पुरस्कार भारतीय राजदूत महेश सचदेव को, संस्कृति पुरस्कार
नार्वेजीय कवियित्री और कलाकार इंगेर मारिये लिल्लेएंगेन को, साहित्य पुरस्कार यू के में कवि और कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव को और कला पुरस्कार भारत से आये कलाकार (चित्रकार) और कलाविद्यालय के प्रधानाचार्य गोविन्दर सोहल को ससम्मान प्रदान किया गया।
इब्सेन, टैगोर और शेक्सपियर एक मंच पर
नार्वे के विश्व प्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इब्सेन, भारत के साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर और यू क़े के सर्वमान्य विलियम शेक्सपियर पहली बार एक साथ प्रस्तुत किये गये। हेनरिक इब्सेन के नाटक च्च्गुड़िया का घरच्च् का अंश सुरेशचन्द्र शुक्ल च्च्शरद आलोकच्च् ने पढ़ा, गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता का सत्स्वर पाठ बंगला और अंग्रेजी में किया प्रो असीमदत्त राय ने और शेक्सपियर के नाटकों की इंग्लैण्ड में लोकप्रियता पर प्रकाश डाला डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने।
सांस्कृतिक कार्यक्रम में भारतीय संगीत, भांगड़ा नृत्य, नार्वेजीय संगीत व नृत्य, कवितापाठ आदि मुख्य आकर्षण थे जिसमें नार्वेजीय, भारतीय, श्रीलंकाई, लेटिन अमरीकी, वियतनामी, बंगलादेशी और पाकिस्तानी कलाकारों नें भाग लिया। कार्यक्रम का शुभारंभ अनुराग सैम शाह ने गांधी जी के प्रिय भजन से किया। फोरम अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह अथवा नवम्बर में ओस्लो में च्च्स्कैन्डि -नेविया में हिन्दीच्च्पर एक सेमिनार और कविसम्मेलन आयोजित कर रही है। कार्यक्रम निश्चित होते ही शीघ्र ही तिथि की जानकारी दी जायेगी। ::माया भारती::
[edit] सिएटल में काव्य गोष्ठी का आयोजन
३० दिसम्बर २००६, सिएटल, संयुक्त राज्य अमेरिका, नव वर्ष की पूर्व संध्या पर सिएटल में निवास कर रहे कवि अभिनव शुक्ल के घर पर एक हिंदी काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप्ति एवं मंजू नें माँ सरस्वती की वंदना से किया। अभ

