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न जाने कैसी आज़ादी /रमा द्विवेदी

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 रचनाकार: रमा द्विवेदी                 


न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
सारे जहां में हो रही रुसवाई है।

’सारे जहां से अच्छा’ गाते रहे हैं हम
अतीत के गौरव को मिट्टी में मिलाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

लूटमार,बलात्कार रोज बढ़ रहे हैं
कानून भी अपराधी को सज़ा दे न पाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है।

दल बदल रहे हैं कुर्सी के वास्ते सब
निज स्वार्थ के लिए सब लड़ रहे लड़ाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

जाने कहां गए वे जो वतन पे जान देते थे
आज तो पद के लिए हो रही आपाधाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

गैरों के ज़ुल्म सहते, शिकवा न था किसी से
अपनों के ज़ुल्म देखकर, रूह थर्राई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

अंधेरों से उजालों में खतरे का डर है ज्यादा
मंदिरों में भी ज़िन्दगी खून से नहाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

दहेज वास्ते बहुएं सताई जाती हैं
अपनों के द्वारा ही नारी गई जलाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

नारी पे ज़ुल्म करके, मर्दानगी दिखाते
किस धर्म ने यह क्रूरता सिखाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

आज़ाद देश में नारी पे ज़ुल्म होते क्यों?
हमारे देश की यह कौन सी बड़ाई है?
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?
गुजरात और कश्मीर में लाशें पटी हुई हैं
खुदा बचाओ अब जान पर बन आई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

चारो तरफ है दहशत, सुरक्षित नहीं कहीं?
हत्यायें देख-देख ज़िन्दगी खुद पे लजाई है
न जाने कैसी आज़ादी हमने पाई है?

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