पंकज-कली! / महादेवी वर्मा
From Hindi Literature
|
कविता कोश की स्थापना के दो वर्ष पूरे! दो वर्ष की उपलब्धियाँ | रचनाकारों की टिप्पणियाँ | अपनी टिप्पणी दीजिये
|
|
रचनाकार: महादेवी वर्मा | |
|
संग्रह का मुखपृष्ठ: सांध्यगीत / महादेवी वर्मा |
क्या तिमिर कह जाता करुण?
क्या मधुर दे जाती किरण?
किस प्रेममय दुख से हृदय में
अश्रु में मिश्री घुली?
किस मलय-सुरभित अंक रह-
आया विदेशी गन्धवह?
उन्मुक्त उर अस्तित्व खो
क्यों तू भुजभर मिली?
रवि से झुलसते मौन दृग,
जल में सिहरते मृदुल पग;
किस व्रतव्रती तू तापसी
जाती न सुख दुख से छली?
मधु से भरा विधुपात्र है,
मद से उनींदी रात है,
किस विरह में अवनतमुखी
लगती न उजियाली भली?
यह देख ज्वाला में पुलक,
नभ के नयन उठते छलक!
तू अमर होने नभधरा के
वेदना-पय से पली!
पंकज-कली! पंकज-कली!
