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पद्मावती-रूप-चर्चा-खंड / मलिक मोहम्मद जायसी

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CHANDER

मुखपृष्ठ: पद्मावत / मलिक मोहम्मद जायसी

वह पदमिनि चितउर जो आनी । काया कुंदन द्वादसबानी ॥
कुंदन कनक ताहि नहिं बासा । वह सुगंध जस कँवल बिगासा ॥
कुंदन कनक कठोर सो अंगा । वह कोमल, रँग पुहुप सुरंगा ॥
ओहि छुइ पवन बिरिछ जेहि लागा । सोइ मलयागिरि भएउ सुभागा ॥
काह न मूठी-भरी ओहि देही ?। असि मूरति केइ देउ उरेही ?॥
सबै चितेर चित्र कै हारे । ओहिक रूप कोइ लिखै न पारे ॥
कया कपूर, हाड सव मोती । तिन्हतें अधिक दीन्ह बिधि जोती ॥

सुरुज-किरिन जसि निरमल, तेहितें अधिक सरीर ।
सौंह दिस्ट नहिं जाइ करि, नैनन्ह आवै नीर ॥1॥

ससि-मुख जबहिं कहै किछु बाता । उठत ओठ सूरुज जस राता ॥
दसन दसन सौं किरिन जो फूटहिं । सब जग जनहुँ फुलझरी छूटहिं ॥
जानहुँ ससि महँ बीजु देखावा । चौंधि परै किछु कहै न आवा ॥
कौंधत अह जस भादौं-रैनी । साम रैनि जनु चलै उडैनी ॥
जनु बसंत ऋतु कोकिल बोली । सुरस सुनाइ मारि सर डोली ॥
ओहि सिर सेस नाग जौ हरा । जाइ सरन बेनी होइ परा ॥
जनु अमृत होइ बचन बिगासा । कँवल जो बास बास धनि पासा ॥

सबै मनहि हरि जाइ मरि जो देखै तस चार ।
पहिले सो दुख बरनि कै, बरनौ ओहिक सिंगार ॥2॥

कित हौं रहा काल कर काढा । जाइ धौरहर तर भा ठाढा ॥
कित वह आइ झरोखै झाँकी । नैन कुरँगिनि, चितवनि बाँकी ॥
बिहँसि ससि तरईं जनु परी । की सो रैनि छूटीं फुलझरी ॥
चमक बीजु जस भादौं रैनी । जगत दिस्टि भरि रही उडैनी ॥
काम-कटाछ दिस्टि विष बसा । नागिनि-अलक पलक महँ डसा ॥
भौंह धनुष, पल काजर बूडी । वह भइ धानुक, हौं भा ऊडी ॥
मारि चली, मारत हू हँसा । पाछे नाग रहा, हौं डँसा ॥

काल घालि पाछे रखा, गरुड न मंतर कोइ ।
मोरे पेट वह पैठा, कासौं पुकारौं रोइ ? ॥3॥

बेनी छोरि झार जौ केसा । रैनि होइ ,जग दीपक लेसा ॥
सिर हुत बिसहर परे भुइँ बारा । सगरौं देस भएउ अँधियारा ॥
सकपकाहिं विष-भरे पसारे । लहरि-भरे लहकहिं अति कारे ॥
जानहुँ लोटहिं चढे भुअंगा । बेधे बास मलयगिरि-अंगा ॥
लुरहिं मुरहिं जनु मानहिं केली । नाग चढे मालति कै बेली ॥
लहरैं देइ जनहुँ कालिंदी । फिरि फिरि भँवर होइ चित-बंदी ॥
चँवर ढुरत आछै चहुँ पासा । भँवर न उडहिं जो लुबुधे बासा ॥

होइ अँधियार बीजु धन लाँपै जबहि चीर गहि झाँप ।
केस-नाग कित देख मैं, सँवरि सँवरि जिय काँप ॥4॥

माँग जो मानिक सेंदुर-रेखा । जनु बसंत राता जग देखा ॥
कै पत्रावलि पाटी पारी । औ रुचि चित्र बिचित्र सँवारी ॥
भए उरेह पुहुप सब नामा । जनु बग बिखरि रहे घन सामा ॥
जमुना माँझ सुरसती मंगा । दुहुँ दिसि रही तरंगिनी गंगा ॥
सेंदुर-रेख सो ऊपर राती । बीरबहूटिन्ह कै जसि पाँती ॥
बलि देवता भए देखी सेंदूरू । पूजै माँग भोर उटि सूरू ॥
भोर साँझ रबि होइ जो राता । ओहि रेखा राता होइ गाता ॥

बेनी कारी पुहुप लेइ निकसी जमुना आइ ।
पूज इंद्र आनंद सौं सेंदुर सीस चढाइ ॥5॥

दुइज लिलाट अधिक मनियारा । संकर देखि माथ तहँ धारा ॥
यह निति दुइज जगत सब दीसा । जगत जोहारै देइ असीसा ॥
ससि जो होइ नहिं सरवरि छाजै । होइ सो अमावस छपि मन लाजै ॥
तिलक सँवारि जो चुन्नी रची । दुइज माँझ जनहुँ कचपची ॥
ससि पर करवत सारा राहू । नखतन्ह भरा दीन्ह बड दाहू ॥
पारस-जोति लिलाटहि ओती । दिस्टि जो करै होइ तेहि जोती ॥
सिरी जो रतन माँग बैठारा । जानहु गगन टूट निसि तारा ॥

ससि औ सूर जो निरमल तेहि लिलाट के ओप ।
निसि दिन दौरि न पूजहिं, पुनि पुनि होहिं अलोप ॥6॥

भौहैं साम धनुक जनु चढा । बेझ करै मानुष कहँ गढा ॥
चंद क मूठि धनुक वह ताना । काजर मनच, बरुनि बिष-बाना ॥
जा सहुँ हेर जाइ सो मारा । गिरिवर टरहिं भौंह जो टारा ॥
सेतुबंध जेइ धनुष बिगाडा । उहौ धनुष भौंहन्ह सौं हारा ॥
हारा धनुष जो बेधा राहू । और धनुष कोइ गनै न काहू ॥
कित सो धनुष मैं भौंहन्ह देखा । लाग बान तिन्ह आउ न लेखा ॥
तिन्ह बानन्ह झाँझर भा हीया । जो अस मारा कैसे जीया ?॥

सूत सूत तन बेधा, रोवँ रोवँ सब देह ।
नस नस महँ ते सालहिं, हाड हाड भए बेह ॥7॥

नैन चित्र एहि रूप चितेरा । कँवल-पत्र पर मधुकर फेरा ॥
समुद-तरंग उठहि जनु राते । डोलहि औ घूमहिं रस-माते ॥
सरद-चंद महँ खंजन-जोरी । फिरि फिरि लरै बहोरि बहोरी ॥
चपल बिलोल डोल उन्ह लागे । थिर न रहै चंचल बैरागे ॥
निरखि अघाहिं न हत्या हुँते । फिरि फिरि स्रवनन्ह लागहिं मते ॥
अंग सेत, मुख साम सो ओही । तिरछे चलहिं सूध नहिं होहीं ॥
सुर, नर, गंध्रब लाल कराहीं । उथले चलहिं सरग कहँ जाहीं ॥

अस वै नयन चक्र दुइ भँवर समुद उलथाहिं ।
जनु जिउ घालि हिंडोलहिं लेइ आवहिं, लेइ जाहिं ॥8॥

नासिक-खडग हरा धनि कीरू । जोग सिंगार जिता औ बीरू ॥
ससि-मुँह सौंहँ खडग देइ रामा । रावन सौं चाहै संग्रामा ॥
दुहुँ समुद्र महँ जनु बिच नीरू । सेतु बंध बाँधा रघुबीरू ॥
तिल के पुहुप अस नासिक तासू । औ सुगंध दीन्ही बिधि बासू ॥
हीर-फूल पहिरे उजियारा । जनहुँ सरद ससि सोहिल तारा ॥
सोहिल चाहि फूल वह ऊँचा । धावहिं नखत, न जाइ पहूँचा ॥
न जनौं कैस फूल वह गढा । बिगसि फूल सब चाहहिं चढा ॥

अस वह फूल सुबासित भएउ नासिका-बंध ।
जेत फूल ओहि हिरकहिं तिन्ह कहँ होइ सुगंध ॥9॥

अधर सुरंग, पान अस खीने । राते-रंग, अमिय-रस-भीने ॥
आछहिं भिजे तँबोल सौं राते । जनु गुलाल दीसहिं बिहँसाते ॥
मानिक अधर, दसन जनु हीरा । बैन रसाल, काँड मुख बीरा ॥
काढे अधर डाभ जिमि चीरा । रुहिर चुवै जौ खाँडै बीरा ॥
ढारै रसहि रसहि रस-गीली । रकत-भरी औ सुरँग रँगीली ॥
जनु परभात राति रवि-रेखा । बिगसे बदन कँवल जनु देखा ॥
अलक भुअंगिनि अधरहि राखा । गहै जो नागिनि सो रस चाखा ॥

अधर अधर रस प्रेम कर, अलक भुअंगिनि बीच ।
तब अमृत-रस पावै जब नागिनि गहि खींच ॥10॥

दसन साम पानन्ह-रँग-पाके । बिगसे कँवल माँह अलि ताके ॥
ऐसि चमक मुख भीतर होई । जनु दारिउँ औ साम मकोई ॥
चमकहिं चौक बिहँस जौ नारी । बीजु चमक जस निसि अँधियारी ॥
सेत साम अस चमकत दीठी । नीलम हीरक पाँति बईठी ॥
केइ सो गढे अस दसन अमोला । मारै बीजु बिहँसि जौ बोला ॥
रतन भीजि रस-रंग भए सामा । ओही छाज पदारथ नामा ॥
कित वै दसन देख रस-भीने । लेइ गइ जोति, नैन भए हीने ॥

दसन-जोति होइ नैन-मग हिरदय माँझ पईठ ।
परगट जग अँधियार जनु, गुपुत ओहि मैं दीठ ॥11॥

रसना सुनहु जो कह रस-बाता । कोकिल बैन सुनत मन राता ॥
अमृत-कोंप जीभ जनु लाई । पान फूल असि बात सोहाई ॥
चातक-बैन सुनत होइ साँती । सुनै सो परै प्रेम-मधु माती ॥
बिरवा सूख पाव जस नीरू । सुनत बैन तस पलुह सरीरू ॥
बोल सेवाति-बूँद जनु परहीं । स्रवन-सीप-मुख मोती भरहीं ॥
धनि वै बैन जो प्रान-अधारू । भूखे स्रवनहिं देहिं अहारू ॥
उन्ह बैनन्ह कै काहि न आसा । मोहहि मिरिग बीन-विस्वासा ॥

कंठ सारदा मोहै, जीभ सुरसती काह ?
इंद्र, चंद्र, रवि देवता सबै जगत मुख चाह ॥12॥

स्रवन सुनहु जो कुंदन-सीपी । पहिरे कुंडल सिंघलदीपी ॥
चाँद सुरुज दुहुँ दिसि चमकाहीं । नखतन्ह भरे निरखि नहिं जाहीं ॥
खिन खिन करहिं बीजु अस काँपा । अँबर-मेघ महँ रहहिं न झाँपा ॥
सूक सनीचर दुहुँ दिसि मते । होहिं निनार न स्रवनन्ह-हुँते ॥
काँपत रहहिं बोल जो बैना । स्रवनन्ह जौ लागहि फिर नैना ॥
जस जस बात सखिन्ह सौं सुना । दुहुँ दिसि करहिं सीस वै धुना ॥
खूँट दुवौ अस दमकहिं खूँटी । जनहु परै कचपचिया टूटी ॥

वेद पुरान ग्रंथ जत स्रवन सुनत सिखि लीन्ह ।
नाद विनोद राग रस-बंधक स्रवन ओहि बिधि दीन्ह ॥13॥

कँवल कपोल ओहि अस छाजै । और न काहु देउ अस साजै ॥
पुहुक-पंक रस-अमिय सँवारे । सुरँग गेंद नारँग रतनारे ॥
पुनि कपोल वाएँ तिल परा । सो तिल बिरह-चिनगि कै करा ॥
जो तिल देख जाइ जरि सोई । बएँ दिस्टि काहु जिनि होई ॥
जानहुँ भँवर पदुम पर टूटा । जीउ दीन्ह औ दिए न छूटा ॥
देखत तिल नैनन्ह गा गाडी । और न सूझै सो तिल छाँडी ॥
तेहि पर अलक मनि-जरि डोला । छुबै सो नागिनि सुरंग कपोला ॥

रच्छा करै मयूर वह, नाँघि न हिय पर लोट ।
गहिरे जग को छुइ सकै, दुई पहार के ओट ॥14॥

गीउ मयूर केरि जस ठाढी । कुंदै फेरि कुंदेरै काढी ॥
धनि वह गीउ का बरनौं करा । बाँक तुरंग जनहुँ गहि परा ॥
घिरिन परेवा गीउ उठावा । चहै बोल तमचूर सुनावा ॥
गीउ सुराही कै अस भई । अमिय पियाला कारन नई ॥
पुनि तेहि ठाँव परी तिनि रेखा । तेइ सोइ ठाँव होइ जो देखा ॥
सुरुज-किरिनि हुँत गिउ निरमली । देखे बेगि जाति हिय चली ॥
कंचन तार सोह गिउ भरा । साजि कँवल तेहि ऊपर धरा ॥

नागिनि चढी कँवल पर , चढि कै बैठ कमंठ ।
कर पसार जो काल कहँ, सो लागै ओहि कंठ ॥15॥

कनक दंड भुज बनी कलाई । डाँडी-कँवल फेरि जनु लाई ॥
चंदन खाँभहि भुजा सँवारी । जानहुँ मेलि कँवल-पौनारी ॥
तेहि डाँडी सँग कवँल-हथोरी । एक कँवल कै दूनौ जोरी ॥
सहजहि जानहु मेँहदी रची । मुकुताहल लीन्हें जनु घुँघची ॥
कर-पल्लव जो हथोरिन्ह साथा । वै सब रकत भरे तेहि हाथा ॥
देखत हिया काढि जनु लेई । हिया काढि कै जाई न देई ॥
कनक-अँगूठी औ नग जरी । वह हत्यारिन नखतन्ह भरी ॥

जैसी भुजा कलाई, तेहि बिधि जाइ न भाखि ।
कंकन हाथ होइ जहँ, तहँ दरपन का साखि ? ॥16॥

हिया थार, कुच कनक-कचोरा । जानहुँ दुवौ सिरीफल-जोरा ॥
एक पाट वै दूनौ राजा । साम छत्र दूनहुँ सिर छाजा ॥
जानहुँ दोउ लटु एक साथा । जग भा लटू,चढै नहिं हाथा ॥
पातर पेट आहि जनु पूरी । पान अधार, फूल अस फूरी ॥
रोमावली ऊपर लटु घूमा । जानहु दोउ साम औ रूमा ॥
अलक भुअंगिनि तेहि पर लोटा । हिय -घर एक खेल दुइ गोटा ॥
बान पगार उठे कुच दोऊ । नाँघि सरन्ह उन्ह पाव न कोऊ ॥

कैसहु नवहिं न नाए , जोबन गरब उठान ।
जो पहिले कर लावै , सो पाछे रति मान ॥17॥

भृंग-लंक जनु माँझ न लागा । दुइ खंड-नलिन माँझ जनु तागा ॥
जब फिरि चली देख मैं पाछे । अछरी इंद्रलोक जनु काछे ॥
जबहिं चली मन भा पछिताऊ । अबहूँ दिस्टि लागि ओहि ठाऊ ।
अछरी लाजि छपीं गति ओही । भईं अलोप, न परगट होहीं ॥
हंस लजाइ मानसर खेले । हस्ती लाजि धूरि सिर मेले ॥
जगत बहुत तिय देखी महूँ । उदय अस्त अस नारि न कहूँ ॥
महिमंडल तौ ऐसि न कोई । ब्रह्मंडल जौ होइ तो होई ॥

बरनेउँ नारि, जहाँ लगि, दिस्टि झरोखे आइ ।
और जो अही अदिस्ट धनि, सो किछु बरनि न जाइ ।18॥

का धनि कहौं जैसि सुकुमारा । फूल के छुए होइ बेकरारा ॥
पखुरी काढहि फूलन सेंती । सोई डासहिं सौंर सपेती ॥
फूल समूचै रहै जौ पावा । व्याकुल होइ नींद नहिं आवा ॥
सहै न खीर, खाँड औ घीऊ । पान-अधार रहै तन जीऊ ॥
नस पानन्ह कै काढहि हेरी । अधर न गडै फाँस ओहि केरी ॥
मकरि क तार तेहि कर चीरू । सो पहिरे छिरि जाइ सरीरू ॥
पालग पावँ, क आछै पाटा । नेत बिछाव चलै जौ बाटा ॥

घालि नैन ओहि राखिय, पल नहिं कीजिय ओट ।
पेम का लुबुधा पाव ओहि, काह सो बड का छोट ॥19॥

जौ राघव धनि बरनि सुनाई । सुना साह, गइ मुरछा आई ॥
जनु मूरति वह परगट भई । दरस देखाइ माहिं छपि गई ॥
जो जो मंदिर पदमिनि लेखी । सुना जौ कँवल कुमुद अस देखी ॥
होइ मालति धनि चित्त पईठी । और पुहुप कोउ आव न दीठी ॥
मन होइ भँवर भएउ बैरागा । कँवल छाँडि चित और न लागा ॥
चाँद के रंग सुरुज जस राता । और नखत सो पूछ न बाता ॥
तब कह अलाउदीं जग-सूरू । लेउँ नारि चितउर कै चूरू ॥

जौ वह पदमिनि मानसर, अलि न मलिन होइ जात ।
चितउर महँ जो पदमिनी फेरि उहै कहु बात ॥20॥

ए जगसूर ! कहौं तुम्ह पाहाँ । और पाँच नग चितउर माहाँ ॥
एक हंस है पंखि अमोला । मोती चुनै, पदारथ बोला ॥
दूसर नग जौ अमृत-बसा । सो विष हरै नाग कर डसा ॥
तीसर पाहन परस पखाना ।लोह छुए होइ कंचन-बाना ॥
चौथ अहै सादूर अहेरी । जो बन हस्ति धरै सब घेरी ॥
पाँचव नग सो तहाँ लागना । राजपंखि पेखा गरजना ॥
हरिन रोझ कोइ भागि न बाँचा । देखत उडै सचान होइ नाचा ॥

नग अमोल अस पाँचौ भेंट समुद ओहि दीन्ह ।
इसकंदर जो न पावा सो सायर धँसि लीन्ह ॥21॥

पान दीन्ह राघव पहिरावा । दस गज हस्ति घोड सो पावा ॥
औ दूसर कंकन कै जोरी । रतन लाग ओहि बत्तिस कोरी ॥
लाख दिनार देवाई जेंवा । दारिद हरा समुद कै सेवा ॥
हौ जेहि दिवस पदमिनी पावौं । तोहि राघव चितउर बैठावौं ॥
पहिले करि पाँचौं नग मूठी । सो नग लेउँ जो कनक-अँगूठी ॥
सरजा बीर पुरुष बरियारू । ताजन नाग, सिंघ असवारू ॥
दीन्ह पत्र लिखि, बेगि चलावा । चितउर-गढ राजा पहँ आवा ॥

राजै पत्र बँचावा, लिखी जो करा अनेग ।
सिंगल कै जो पदमिनी, पठै देहु तेहि बेग ॥22॥


(1)बासा = महक, सुगंध । ओहि छुइ ....सभागा = उसको छूकर वायु जिन पेडों में लगी वे मलयागिरि चंदन हो गए । काह न मूठि...देही = उस मुट्ठी भर देह में क्या नहीं है ? चितेर = चित्रकार ।

(2) सामरैनि = अँधेरी रात । उडैनी = जुगनू । सर = बाण । चार = ढंग, ढब । दुख = उसके दर्शन से उत्पन्न विकलता ।

(3) काल कर काढा = काल का चुना हुआ ।पल =पलक । बूडी = डूबी हुई । धानुक = धनुष चलानेवाली । ऊडी = पनडुब्बी चिडिया । घालि....रखा = डाल रखा ।

(4) झार = झारती है । जग दीपक लेसा = रात समझकर लोग दीया जलाने लगते हैं । सिर हुँत = सिर से । बिसहर =बिषधर, साँप । सकपकाहिं = हिलते डोलते हैं । लहकहिं = लहराते हैं, झपटते हैं । लुरहिं = लोटते हैं । फिरि फिरि भँवर = पानी के भँवर में चक्कर खाकर । बन्दी = कैद , बँधुवा । ढुरत आछै = ढरता रहता है । झाँप = ढाँकती है ।

(5) पत्रावलि = पत्रभंग-रचना । पाटी = माँग के दोनों ओर बैठाए हुए बाल । उरेह =विचित्र सजावट । बग = बगल । पूजै = पूजन करता है ।

(6) मनियारा = कांतिमान् = सोहावना । चुन्नी = चमकी या सितारे जो माथे या कपोलों पर चिपकाए जाते हैं । पारस-जोति = ऐसी ज्योति जिससे दूसरी वस्तु को ज्योति हो जाय । सिरी = श्री नाम का आभूषण । ओप = चमक । पूजहिं = बराबरी को पहुँचते हैं ।

(7) बेझ करै बेध करने के लिये । पनच = पतंचिका, धनुष की डोरी । बिहाडा = नष्ट किया । धनुष जो बेधा राहू = मत्स्यबेध करने वाला अर्जुन का धनुष । आउ न लेखा = आयु को समाप्त समझा । बेह = बेध, छेद । (8) नैन चित्र...चितेरा = नेत्रों का चित्र इस रूप से चित्रित हुआ है । चितेरा = चित्रित किया गया । बहोरि बहोरी = फिर फिर ।फिरि फिरि = घूम घूम कर । मते सलाह = करने में । अँग सेत...ओही = आँखों के सफेद डेले और काली पुतलियाँ । लाल = लालसा ।

(9) कीरू = तोता । सोहिल तारा = सुहेल तारा जो चंद्रमा के पास रहता है । बिगसि फूल..चढा = फूल जो खिलते हैं मानों उसी पर निछा वर होने के लिये ।

(10) काढे अधर...चीर = जैसे कुश का चीरा लगा हो ऐसे पतले ओठ हैं जो खाँडै बीरा = जब बीडा चबाती है । जनु परभात...देखा = मानों विकसित कमलमुख पर सूर्य की लाल किरनें पडी हों ।ताके = दिखाई पडे । मकोई = जंगली मकोय जो काली होती है । कित वै दसन...भीने = कहाँ से मैंने उन रंग-भीने दाँतों को देखा ।

(12) कोंप = कोंपल, नया कल्ला । साँती = शांति । माती =मात कर । बिरवा पेड । सूख = सूखा हुआ । पलुह = पनपता है, हरा होता है । बीन बिस्वासा = बीन समझकर ।

(13) कुंदन सीपी = कुंदन की सीप (ताल के सीपों का आधा संपुट ) अंबर = वस्त्र । खूँट = कोना, ओर । खूँटी = खूँट नाम का गहना कचपचिया = कृत्तिका नक्षत्र । पुहुप पंक = फूल का कीचड या पराग । कै करा = के रूप, के समान । बाएँ दिस्टि...होई= किसी की बाईं ओर न जाय क्योंकि वहाँ तिल है । गा गाडी = गड गया । दुइ पहार = अर्थात् कुच ।

(15) कुदै = खराद पर । कुँदेरै = कुँदेरे ने । करा =कला, शोभा । घिरिन परेवा = गिरह बाज कबूतर । तमचूर = मुर्गा । तेइ सोइ ठाँव...देखा = जो उसे देखता है वह उसी जगह ठक रह जाता है । जाति हिय चली = हृदय में बस जाती है । नागिनि = अर्थात् केश । कमंठ = कछुए के समान पीठ या खोपडी ।

(16) डाँडी कँवल ....लाई = कमलनाल उलटकर रखा हो । कर-पल्लव = उँगली । साखि = साक्षी । कंगन हाथ...साखि = हाथ कंगन को आरसी क्या ?

(17) कचोरा = कटोरा । पाट = सिंहासन । साम छत्र = अर्थात् कुच का श्याम अग्रभाग । लट्टू = लट्टू । फूरी = फूली । साम = शाम (सीरिया) का मुल्क जो अरब के उत्तर है । घर =खाना, कोठा । गोटा = गोटी । पगार = प्राकार या परकोटे पर ।

(18) देख = देखा । खेले = चले गए । ब्रह्मँडल = स्वर्ग ।

(19) बेकरारा = बेचैन । डासहिं = बिछाती हैं । सौंर = चादर । फाँस = कडा तंतु । मकरि क तार = मकडी के जाले सा महीन । छिरि जाइ = छिल जाता है । पालँग पाँव...पाटा= = पैर या तो पलंग पर रहते हैं या सिंहासन पर । नेत = रेशमी कपडे की चादर, नेत्र ।

(20) माहिं = भीतर हृदय के । जो जो मंदिर...देखी = अपने घर की जिन जिन स्त्रियों को पद्मिनी समझ रखा था वे पद्मिनी (कँवल) का वृत्तांत सुनने पर कुमुदिनी के समान लगने लगीं । चूरू कै = तोडकर । मलिन = हतोत्साह ।

(21) पदारथ = बहुत उत्तम बोल । परस पखाना = पारस पत्थर । सादूर शार्दूल सिंह । लागना = लगनेवाला, शिकार करनेवाला । गरजन = गरजनेवाला । रोझ = नीलगाय । सचान =बाज । सायर समुद्र ।

(22) जेंवा =दक्षिणा में । ताजन नाग = नाग का कोडा । करा = कला से, चतुराई से ।

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